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कोरोना संकट में भी नहीं याद आए ‘डॉक्टर साहब’

हनुमानगढ़. कोरोना संक्रमण संकट में राज्य सरकार ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार के लिए बीते डेढ़ वर्ष में साधन-संसाधन जुटाने पर खास ध्यान दिया है।

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कोरोना संकट में भी नहीं याद आए 'डॉक्टर साहब'

कोरोना संकट में भी नहीं याद आए 'डॉक्टर साहब'

कोरोना संकट में भी नहीं याद आए 'डॉक्टर साहब'
- होम्योपैथी चिकित्सकों की बरसों से नहीं की गई भर्ती
- भर्ती नहीं होने से चिकित्सकों में आक्रोश मिश्रित निराशा
हनुमानगढ़. कोरोना संक्रमण संकट में राज्य सरकार ने प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था में सुधार के लिए बीते डेढ़ वर्ष में साधन-संसाधन जुटाने पर खास ध्यान दिया है। इसके तहत चिकित्सकों से लेकर नर्सिंगकर्मी, लैब तकनीशियन, रेडियोग्राफर तक की भर्ती की गई है। यह प्रक्रिया अब भी जारी है। मगर महामारी के इस विकट समय में भी होम्योपैथी चिकित्सकों की याद सरकार को नहीं आई। जबकि होम्योपैथी चिकित्सक उम्मीद लगाए बैठे थे कि संक्रमण संकट में उनको भी सरकारी सेवा में लिया जाएगा।
उनकी यह आस धरी रह गई। इससे होम्योपैथी चिकित्सकों में आक्रोश मिश्रित निराशा है। खास बात यह कि प्रदेश में होम्योपैथी चिकित्सकों की स्थाई पदों पर भर्ती निकाले हुए आठ वर्ष से भी ज्यादा समय गुजर चुका है। एलोपैथी को छोड़कर यदि आयुर्वेद से भी तुलना की जाए तो राज्य में होम्योपैथी चिकित्सकों के पद केवल पांच प्रतिशत के लगभग ही हैं। जबकि रोग निदान एवं उपचार के लिहाज से दिनोंदिन होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों में जागरुकता एवं रुचि बढ़ रही है।
हाल बड़ा खराब
जानकारी के अनुसार प्रदेश के सरकारी अस्पतालों आदि में आयुष चिकित्सकों के लगभग 4476 पद हैं। वहीं एलोपैथी चिकित्सकों के पद तो इससे कई गुणा ज्यादा हैं। मगर होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति की स्थिति चिकित्सक भर्ती एवं पदों के मामले में बहुत खराब है। राज्य में होम्योपैथी चिकित्सकों के कुल पद महज 296 बताए गए हैं। कमोबेश यही स्थिति युनानी चिकित्सा पद्धति की है।
बहुत कारगर, मिले प्रोत्साहन
होम्योपैथी चिकित्सक दिलीप कालवा का कहना है कि बहुत सी ऐसी बीमारियां हैं जिनमें रोगी को चिकित्सक बोल देते हैं कि इसकी दवा उम्र भर खानी होगी। लेकिन उन बीमारियों को कुछ ही समय में होम्योपैथी पद्धति से ठीक किया जा सकता है। फिर समझ नहीं आता कि आखिर क्यों होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को सरकार आमजन तक पहुंचाने में परहेज बरत रही है। एक तरह से सरकारों का सर्वाधिक एलोपैथी और उसके बाद आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर रहा है। इससे किसी को भी दिक्कत नहीं है। यह होना भी चाहिए। मगर होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति पर भी सरकारों को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए।