मंदिर के पुजारी काशीराम योगी ने बताया कि भीलट देव का जन्म गवली परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम मेदा गोलन व पिता का नाम देव रहलन था। प्रचलित कथा के अनुसार गवली परिवार देव रहलन व माता मेदा शिव के परम भक्त थे। उनकी संतान नहीं थी। भोलेनाथ की कठोर तपस्या के बाद शिवजी पार्वती ने उन्हें सुंदर बालक के रूप में भीलट देव को जन्म देकर वचन लिया कि वे प्रतिदिन दूध दही मांगने आएंगे। यदि आपने हमें नहीं पहचाना तो इस बालक को उठा ले जाएंगे। लालन-पालन में एक दिन दोनों ही शिव.पार्वती को दिया वचन भूल गए। तभी शिव जी ने बालक को उठाया व पालने में अपने गले का नाग रख बालक को लेकर चौरागढ़ (पचमढ़ी) चले गए। इधर, पालने में नाग देवता को देखकर माता मेदा व रेहलनजी बेसुध हो गए। उन्होंने वापस शिव-पार्वती की तपस्या की शिव पार्वती ने कहा कि हमारे वचन अनुसार आपने हमें पहचाना नहीं हम बालक को शिक्षा दीक्षा करेंगे। पालने में हमने जो नाग छोड़ा है। उसकी पूजा दोनों रूप में होगी भीलट व नाग रूप में। कहा जाता है कि तब भोलेनाथ माचक नदी के किनारे स्थित जलाधेश्वर मंदिर में रात्रि रुके थे। इस स्थान पर भी श्रद्धालु पूजन अर्चन करते हैं। योगी ने बताया कि भोलेनाथ अपने साथ भीलट देव को चौरागढ़ लेकर गए थे। पालन पोषण के बाद बंगाल में राजा गंधी की बेटी राजल से उनका विवाह हुआ था। बाद में उन्हें नागलवाड़ी का राज मिला। बड़वानी जिले की राजपुर तहसील के नागलवाड़ी गांव में भीलट देव शिखरधाम है। ये सैकड़ों वर्षों से शिखरधाम के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुजारी योगी ने बताया कि रोलगांव के इस मंदिर से बीते 45 साल से रोज सुबह श्रीराम फेरी निकलती है। वहीं 60 साल से अखंड ज्योत प्रज्जवलित है। रोलगांव सरपंच पायल राजेश यादव ने बताया कि पुरातात्विक महत्व के इस स्थल के रखरखाव की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा। हरसाल माचक की बाढ़ में यह बदहाल होते जा रहा है। उन्होंने प्रशासन से इसके जीर्णोद्धार की दिशा में कार्रवाई की मांग की है।