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जानिए इस उम्र में नींद पूरी नहीं लेंगे, तो 60 के बाद क्या होगा

नए शोध के अनुसार जिन लोगों की 30 और 40 की उम्र में नींद अधिक बाधित होती है, उनमें एक दशक बाद याददाश्त और सोच संबंधी समस्याएं होने की संभावना अधिक हो सकती है। हालांकि न्यूरोलॉजी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन यह साबित नहीं करता है कि नींद की गुणवत्ता संज्ञानात्मक गिरावट का कारण बनती है। यह केवल एक जुड़ाव दर्शाता है.
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जयपुर

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Jaya Sharma

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Updated: 4 Jan 2024, 2:07 PM IST

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शोधकर्ताओं का कहना है कि अल्जाइमर रोग के लक्षण शुरू होने से कई दशक पहले मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं, जीवन में पहले नींद और अनुभूति के बीच संबंध को समझना बीमारी के जोखिम कारक के रूप में नींद की समस्याओं की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। निष्कर्ष बताते हैं कि मध्य आयु में नींद की क्वालिटी बहुत मायने रखती है। इस अध्ययन में 40 वर्ष की औसत आयु वाले 526 लोगों को शामिल किया गया। उन पर 11 वर्षों तक नज़र रखी गई।

नींद की अवधि और गुणवत्ता को देखा
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की नींद की अवधि और गुणवत्ता को देखा। प्रतिभागियों ने अपने औसत की गणना करने के लिए लगभग एक वर्ष के अंतराल पर दो अवसरों पर लगातार तीन दिनों तक कलाई गतिविधि मॉनिटर पहना। प्रतिभागी औसतन छह घंटे सोए।

डायरी में नोट किया
प्रतिभागियों ने नींद की डायरी में सोने और जागने के समय की भी सूचना दी और शून्य से 21 तक के स्कोर के साथ नींद की गुणवत्ता सर्वेक्षण पूरा किया, जिसमें उच्च स्कोर खराब नींद की गुणवत्ता का संकेत देते हैं। कुल 239 लोगों या 46 प्रतिशत ने पांच से अधिक स्कोर के साथ खराब नींद की सूचना दी। प्रतिभागियों ने स्मृति और सोच परीक्षणों की एक श्रृंखला भी पूरी की।

शोध में यह निकलकर आया
सबसे अधिक बाधित नींद वाले 175 लोगों में से, 10 साल बाद 44 लोगों का संज्ञानात्मक प्रदर्शन खराब था, जबकि सबसे कम बाधित नींद वाले 176 लोगों में से 10 की तुलना में थे। उम्र, लिंग, नस्ल और शिक्षा के आधार पर समायोजन करने के बाद, जिन लोगों की नींद सबसे अधिक बाधित हुई, उनमें सबसे कम बाधित नींद वाले लोगों की तुलना में खराब संज्ञानात्मक प्रदर्शन होने की संभावना दोगुनी से भी अधिक थी।

डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खा अपनी मर्जी से ना आजमाएं। इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

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