
राष्ट्रीय पुरातत्व धरोहर की अनदेखी: आदमगढ़ बड़ी पहाडिय़ा के मिट रहे शैलचित्र
देवेंद्र अवधिया
होशंगाबाद. विंध्य पर्वतमाला में विद्यमान शहर सीमा में आईटीआई रोड-इटारसी बायपास किनारे राष्ट्रीय पुरातत्व की धरोहर आदमगढ़ बड़ी पहाडिय़ा की गुफाएं संरक्षित क्षेत्र है, जिसमें 18 विशालकाय चट्टान-शिलाओं पर इतिहास के विभिन्न शैल चित्र जिसमें युद्ध कौशल, डायनासोर, आदि मानव सहित अन्य दुर्लभ आकृतियां है, लेकिन देखरेख और सुरक्षा के अभाव में ये शनै:शनै: नष्ट होती जा रही है। करीब आठ हजार साल पुराने दुर्लभ और प्रागैतिहासिक शैल चित्र मिटते जा रहे। इसका एक हिस्सा भी ढह चुका है। इसकी देखरेख के जिम्मा केंद्रीय पुरातत्व विभाग संभालता है। पहले इसे भोपाल सर्किल देखता था, लेकिन कुछ साल से इसे जबलपुर सर्किल के अधीन कर दिया गया है। इस प्राचीन व एतिहासिक स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जाना था, लेकिन कोई बड़े काम नहीं हुए। वर्तमान में सिर्फ टिकिट काउंटर बना है, जिसे अब प्रति व्यक्ति ऑफलाइन 25 रुपए और ऑनलाइन 20 रुपे शुल्क लिए जाने लगा है, जबकि पहले यहां नि:शुल्क भ्रमण की सुविधा थी। संरक्षित पहाडिय़ा के आसपास प्रतिबंध के बाद भी तीन सौ मीटर के दायरे में लगातार अतिक्रमण बढ़ रहा है। अभी सिर्फ यह स्थल लवर्स पाइंट बनकर रह गया है। देश-प्रदेश से आने वाले पर्यटकों, इतिहास जानकारों व शोध कर्ताओं की संख्या घट गई है। नए साल 2022 में अभी रोजाना यहां औसतन 50-60 लोग आ रहे। कोरोना संक्रमण के कारण विदेशी पर्यटकों की एंट्री बंद है।
मौसम की मार और असुरक्षा
संभाग एवं प्रदेश में होशंगाबाद की चार किमी क्षेत्र में फैली संरक्षित आदमगढ़ गुफाएं सालों से मौसम की मार जिसमें गर्मी, बारिश-अंधड़ की मार झेल रही है। यह शैलचित्र पाषाण काल तथा मध्यपाषाण काल के हैं। इनकी 18 में से 11 शैल चित्रों वाली चट्टानों (शिलाओं) पर अंकित आश्रय चित्रकारी, दुर्लभ चिन्ह धूमिल हो रहे हैं। कुछ शिलाओं में अब शैल चित्र-चिन्ह दिखाई नहीं देते हैं। पहाडिय़ा के पश्चिमी क्षेत्र में शेल्टर नंबर 15 से लगभग 150 मीटर दूर चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढह चुका है। शैलाश्रयों में पशु जैसे वृषभ, गज, अश्व, सिंह, गाय, जिराफ, हिरण आदि योद्धा, मानवकृतियां, नर्तक, वादक तथा गजारोही, अश्वरोही एवं टोटीदार पात्रों का अंकन है।
पाषाण उपकरण भी गायब हो रहे
आदमगढ़ पहाड़ी क्षेत्र में पाषाण उपकरणों की भरमार है। वर्ष 1960-61 के दौरान हुए उत्खननों में आदमगढ़ से बड़ी मात्रा में पाषाण उपकरण मिले थे। इससे माना जाता है कि यह स्थल आदिमानव द्वारा उपकरणों के निर्माण स्थल के रूप में प्रयुक्त किया गया था, लेकिन वर्तमान में ये उपकरण यहां पर्यटकों व शोधकर्ताओं को दिखाई नहीं देते हैं। इन शैल चित्रों को खनिज रंग जैसे हेमेटाइट, चूना, गेरू आदि में प्राकृतिक गोंद, पशु चर्बी के साथ पाषाण पर प्राकृतिक रूप से प्राप्त पेड़ों के कोमल रेशों अथवा जानवरों के बालों से बनी कूची की सहायता से उकेरा गया था।
पर्यटकों के लिए नहीं बढ़ी सुविधाएं
कहने को आदमगढ़ की गुफाएं होशंगाबाद की एक प्रसिद्ध जगह है। कभी इन गुफाओं में आदिमानव रहा करते थे। शैलचित्रों को देखने हर साल हजारों पर्यटक यहां आते हैं, लेकिन यहां सुविधाएं अभी भी नहीं बढ़ सकी है। मात्र एक टिकिट काउंटर व बाजू में छोटी सी गार्डनिंग हुई है। शिलाओं तक के पहुंचमार्ग के पत्थर उखड़ रहे। परिसर में शिलाओं के आसपास पॉलीथिन का कचरा भी फेंका जा रहा है। सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है। चार-पांच सीमेंटेड बैंचें भर रखी गई है। 11 नंबर शिला के पास सेपरेट लेथबॉथ बना है।
धरोहर से छेड़छाड़ पर है ये प्रावधान
बड़ी पहाडिय़ा संरक्षित स्मारक है। इसे पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के अधीन राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है। प्राचीन स्मारक व पुरातत्वीय स्थल व अवशेष (संशोधन-विधिमान्यकरण) अधिनियम 2020 के तहत यदि कोई भी इस स्मारक को क्षति पहुंचाता, नष्ट करता, मूल स्वरूप में परिवर्तन करता या विरुपित करता है, संकट में डालता है या दुरुपयोग करते हुए पाया जाता है तो उसे इस अपकृत्य के लिए 2 वर्ष तक के कारावास या एक लाख रुपए तक जुर्माने अथवा दोनों का प्रावधान है।
1960-61 में हुई थी गुफाओं की खोज
आदमगढ़ पहाड़ी पर गुफाओं की खोज वर्ष 1960 से 1961 के दौरान हुए उत्खनन के परिणाम स्वरूप हुई थी। प्रचुर मात्रा में पाषाण कालीन बड़े एवं लघु उपकरणों की प्राप्ति हुई थी। संभवत यह स्थल आदिमानव द्वारा उपकरणों के निर्माण स्थल के रूप में प्रयुक्त किया गया था। यहां कुल 18 शैलाश्रय हैं, जिनमें पाषाण एवं ऐतिहासिक कालीन मानव द्वारा बनाए गए उत्कृष्ट चित्र विद्यमान है, जो उनके रचना, कौशल एवं श्रम साध्यता को प्रमाणित करते हैं। आदमगढ़ की गुफाओं की खोज मनोरंजन घोष के द्वारा 1920 में की गई थी।
क्या कहते हैं पर्यटक...
आज मैं शैल चित्र देखने आया था। पर्यटक की दृष्टि से यह परिसर अभी विकसित नहीं हुआ है। पुराने शैत्रचित्र भी सुरक्षा के अभाव में नष्ट होते जा रहे हैं। यहां हरियाली बढऩी चाहिए। बैठने के भी इंतजाम होने चाहिए, क्योकि अब तक यहां शुल्क भी लगने लगा है।
-सोनू बमरेले, पिपरिया
हम दोस्तों के साथ बड़ी पहाडिय़ा के प्राचीनकाल शैलचित्र को देखने आए थे। लेकिन यहां की व्यवस्थाएं ठीक नहीं है। शिलाओं की देखरेख नहीं हो रही। चित्र-चिन्ह मिटने लगे हैं। आने-जाने की सुविधा एवं पर्यटकों की सुरक्षा होनी चाहिए। अभी माहौल ठीक नहीं है। लवर्स पाइंट बन गया है।
अमन सोनी, ग्राम रायपुर
इनका कहना है...
पुरातत्व बड़ी पहाडिय़ा को सुरक्षित रखने पूरे परिसर में बाउड्रीवॉल व गार्डनिंग के लिए नए वित्तीय वर्ष में प्लान तैयार किया जा रहा है। शिलाओं के शैलचित्र-चिन्हों को भी सुरक्षित रखने इन पर शेड लगाए जाएंगे, ताकि धूल-मिट्टी-धूप से नुकसान न हो सके।
-सुभाष कुमार, कन्जरवेटिव असिसेंट, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग जबलपुर
Published on:
20 Jan 2022 12:48 pm
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