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शहर के 36 गुंडे बने प्रशासन के दामाद

साल भर में सिर्फ एक को किया तड़ीपार

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hoshangabad crime and latest news in hindi

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होशंगाबाद. पुलिस हमेशा कमिश्नर प्रणाली की वकालत करती रही है। इसकी प्रमुख वजह है, कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानूनी अधिकार नहीं होना। यही आईएएस और आईपीएस में झगड़े की भी प्रमुख वजह है। अब होशंगाबाद जिले में ही देख लीजिए। पुलिस ४० बदमाशों को तड़ीपार करना चाहती है। इनके प्रस्ताव बनाकर प्रशासन को भेजे हैं। इनमें ३७ मामले तो पिछले साल के हैं, लेकिन जिला प्रशासन अब तक सिर्फ एक ही बदमाश पर जिला बदर की कार्रवाई कर पाया है। अन्य में तर्क है कि साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं,जबकि पुलिस उनके आपराधिक रिकार्ड के चलते ही उन्हें जिले से बाहर करना चाहती है। चुनावी साल होने के कारण एक बार फिर गुंडे-बदमाशों की कुंडली खंगाली जाने लगी है। इसमंे पता चला कि जिला बदर के लिए वर्ष 2017 में 36 और 2018 में तीन प्रकरण तैयार कर जिला प्रशासन को भेजे गए। लेकिन इनमें से एक ही बदमाश सौरभ पिता दीपक मंसौरिया (24) निवासी गुप्ता नर्सिंग होम पर कार्रवाई हो सकी। बाकी के 39 प्रकरण लंबित (विचाराधीन) हैं। यही स्थिति एनएसए के मामले की है। पांच में से सिर्फ एक प्रकरण में आदेश हुए हैं। हाल ही में रिटायर्ड प्रिंसिपल स्व. चंद्राबाई खरे दो मंजिला मकान के पर आरोपी शातिर बदमाश टमंटू उर्फ प्रशांत तिवारी ने कब्जे का प्रयास किया। उस पर वर्ष 2015 में एनएसए की कार्रवाई हुई थी। अब पुलिस उसके साथी बनखेड़ी निवासी मनोज बैरागी की भी हिस्ट्री शीट खुलवा रही है। इन दोनों पर एसपी ने 5-5 हजार रुपए का इनाम घोषित किया है।

इन पर लंबित कार्रवाई

वर्ष 2017 के प्रकरणों में कोतवाली थाना के गिरधारी कटारे निवासी एसपीएम, राजा उर्फ सागर तिवारी निवासी राजा मोहल्ला, नरेश सगर बालागंज, नीतेश कुचबंदिया बालागंज, भगवानदास जाटव रामगंज, मदनलाल जाटव बालागंज, हरिचरण राजपूत जैतपुर (हाल इंदिरा चौक), वसीम बेग बंगाली कॉलोनी, जाहिद अली कोरी मोहल्ला, लीला उर्फ लीलाधर जाटव बंगाली कॉलोनी, जित्तू उर्फ जितेंद्र उर्फ अजय कुचबंदिया बालागंज, महेंद्र पोंडा मेषकर कुचबंदिया बालागंज, अस्सू उर्फ आशिफ खां न्यू जयस्तंभ ग्वालटोली बालागंज तथा अमित पुर्विया व्हीव्ही गिरी वार्ड पिपरिया, आकाश उर्फ अक्कू मेषकर नई गरीबी लाइन इटारसी, संजय ठाकुर आवास कॉलोनी बाबई, रमन पुर्विया वीवी गिरी वार्ड पिपरिया, ब्रजेश राजपूत बीकोर बाबई, पप्पी उर्फ डीके उर्फ दशरथ झा पचमढ़ी आदि शामिल हैं।
एनएसए के भी 5 प्रकरण लंबित

वर्ष 2017 में एनएसए के चार एवं वर्ष 2018 में एक प्रकरण कलेक्टर कोर्ट भेजे गए हैं। जिसमें राजेंद्र उर्फ काजू चौरे गणेशगंज, छोटेलाल कल्याणपुर लखनादौन जिला सिवनी, महेंद्र उर्फ फंटी नाथ पिपरिया, अखिलेश उर्फ अभिषेक उर्फ पलिया पिपरिया और नीतेश उर्फ नित्तू सिंह वंशकार सांडिया रोड पिपरिया शामिल है।

यह हैं अपराध - इन बदमाशों पर मारपीट-अड़ीबाजी, बलवा, आतंक फैलाने, अवैध हथियार, जुआ-सट्टा और शराब, लूट, हत्या, हत्या का प्रयास, अवैध वसूली जैसे संगीन अपराध दर्ज हुए हैं।

जिला बदर के जो भी प्रकरण विचाराधीन है। उनके अभियोजन साक्ष्य के आधार पर निर्णय होते हैं। अभियोजन साक्ष्य की पेशी में समय लग रहा है। प्रकरणों की सुनवाई में तेजी लाई जाएगी।
अविनाश लवानिया, कलेक्टर

हम प्रकरण बनाकर कलेक्ट्रेट भेजते हैं। अगली कार्रवाई वहीं से होती है। पिछले साल 39 और इस साल 3 प्रकरण भेजे हैं। सभी थाना प्रभारियों से कहा है कि गुंडों की नए सिरे से लिस्ट बनाएं व सख्त कार्रवाई करें।
अरविंद सक्सेना, एसपी

टिप्पणी : ब्रजेश चौकसे
गुंडों से किसका याराना!
सीएम शिवराज सिंह चौहान बार-बार कहते हैं, 'गुंडे-बदमाशों में पुलिस का खौफ होना चाहिए, शरीफों में नहीं।Ó पुलिस भी अपनी इस छवि को बदलने के लाख जतन कर रही है। अब तो मानव अधिकार आयोग का भी खौफ कम होने लगा है, फिर ऐसे बदमाशों के जुलूस निकलने लगे है। लेकिन लोकतंत्र में इन गुंडों के भी संरक्षक हैं, उनसे याराना रखते हैं, अपराध कराते हैं और शह देते हैं......। इनके आका बन, इन्हें पनाह देते हैं और इनमें सबसे ऊपर हैं 'माननीयÓ। उनके सरंक्षण में यह आसामाजिक तत्व खूब फल-फूल रहे हैं। प्रशासन के 'दामादÓ बनकर बैठे हैं। पुलिस ने पिछले साल होशंगाबाद जिले के 37 आदतन अपराधियों को जिला बदर करने प्रस्ताव बनाकर जिला प्रशासन को भेजे थे लेकिन सिर्फ एक पर ही कार्रवाई हुई। अन्य पर क्यों नहीं? यह सवाल प्रशासन से कौन पूछे। क्योंकि जिन माननीयों को जनता ने चौकीदारी सौंपी है, वे खामोश हैं, उनकी खामोशी सबकुछ कह रही है। उनके मंचों पर यह जयकारे लगाते दिख जाते हैं। उनकी गाडिय़ों के गेट खोलते हैं और उनके आंदोलन में सहभागी होते हैं। जब पुलिस उन पर शिकंजा कसती है तो नेताजी उनका कवच बनकर प्रकट हो जाते हैं। यह 'शरीफजादेÓ चुनाव में पुलिस और प्रशासन का सिरदर्द बनेंगे। तब उनका इलाज करने के जतन होंगे लेकिन अभी यह जनता का सिरदर्द बने हुए हैं तो किसी को फिक्र नहीं। इन बदमाशों में ही वे बदमाश भी शामिल हैं, जिन्होंने चंद रुपयों की अड़ीबाजी के लिए एक सेल्समैन को बीच रास्ते मौत के घाट उतार दिया था। बाद में उन पर एनएसए की कार्रवाई हुई। लेकिन तब तक यह बदमाश उन गरीब माता-पिता से उनके बुढ़ापे का सहारा छीन चुके थे। हाल ही में निगरानी बदमाशों ने ऑटो से एक व्यक्ति का अपहरण कर लूटपाट की। एक बदमाश मकान पर कब्जा करने के मामले में फरार है। यदि समय रहते इन पर कार्रवाई हुई होती तो शायद किसी मां से उसका बेटा और बहन से उसका भाई नहीं छिनता। पुलिस को शहर रात साढ़े दस बजे बंद नहीं कराना पड़ता, लेकिन संरक्षण के चलते अब गुंडों की फौज खड़ी हो गई है। एक नहीं अब 140 नए गुंडे पैदा हो गए हैं, जिनकी पुलिस को फाइल बनाना पड़ी। ऐसे ही एक दर्जन बदमाश जमानत पर छूटने के बाद फिर वारदात कर चुके हैं। इन बदमाशों की करतूतों का खामियाजा जनता भुगत रही है। पुलिस उन्हें बाहर नहीं करवा पाई तो शहर ही ग्यारह बजे से पहले बंद करा दिया। ताकि शातिर बदमाश किसी बड़ी वारदात को अंजाम न दे सकें। उनके घूमने पर पाबंदी नहीं लगी तो पब्लिक के ही बाहर न निकलने के इंतजाम कर दिए गए। क्या हम, ऐसे ही शहर की कल्पना करते हैं। पूछिए उन चौकीदारों से और इस तंत्र ? को चलाने वाले जिम्मेदार अफसरों से क्यों नहीं वे अपनी जिम्मेदारी निभाते... ताकि हर आम व्यक्ति बेखौफ होकर आधी रात को भी घर से निकलने की हिम्मत कर सके।

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