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पहली बार पार्वती ने भगवान शंकर को पाने रखा था यह व्रत, अन्न, जल का किया था त्याग

मनचाहा वर पाने आप भी कर सकतीं है यह व्रत

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पहली बार पार्वती ने भगवान शंकर को पाने रखा था यह व्रत, अन्न जल का किया था त्याग

पहली बार पार्वती ने भगवान शंकर को पाने रखा था यह व्रत, अन्न जल का किया था त्याग

होशंगाबाद/ कृष्ण जन्माष्टमी के बाद अब हरितालिका तीज का व्रत मनाया जाएगा। इसे तीजा भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को माँ पार्वती ने पहली बार भगवान शिव के लिए रखा था। माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए व्रत तो किया ही साथ ही अन्न, जल का त्याग भी कर दिया था। उन्होंने रेत के शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या भी की थी।

इस व्रत को लेकर भी असमंजस

तीजा व्रत को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कुछ ब्राह्मणों का मत है कि अब व्रत 1 सितंबर 2019 दिन रविवार को मनाना चाहिए। वहीं कुछ ब्राह्मणों का विद्वानों का मत है कि यह व्रत 2 सितंबर को मनाना चाहिए लेकिन मेरे मत के अनुसार पंडित शुभम दुबे और लोक विजय पंचांग के अनुसार यह व्रत 2 सितंबर 2019 दिन सोमवार को मनाना ही सर्वश्रेष्ठ रहेगा। क्योंकि उस दिन सौभाग्य की बात है दिन सोमवार हस्त नक्षत्र युक्त तृतीया तिथि क्योंकि हस्त नक्षत्र तृतीय तिथि में ही माता पार्वती ने इस व्रत को रखा था। इसलिए 2 तारीख में ही इस व्रत को रखना भगवान का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।

यह रहा मुहुर्त
लोक विजय पंचांग की गणना के अनुसार 1 सितंबर को दिन में 11.00 बज के 14 मिनट से तृतीय तिथि का आगमन हो रहा है 2 सितंबर दिन सोमवार को 8.52 तक तृतीया तिथि रहेगी 2 सितंबर को सोमवार में सूर्योदय होगा 5.46 पर हिंदू धर्म के अनुसार सूर्य को प्रधानता देते हुए सूर्य को गति देखते हुए यह व्रत उद्या कालीन तिथि में तृतीय रहेगी। इसलिए सूर्योदय के समय जो तिथि हो वह संपूर्ण दिन मान्य होती है। इसलिए इस व्रत को 2 सितंबर को करना श्रेष्ठ रहेगा। जबकि प्रदोष काल मुहूर्त 6.43 बजे से 8.58 बजे तक रहेगा।

हरतालिका तीज का महत्व
इस दिन माँ पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए पहली बार व्रत रखा था। अन्न, जल का त्याग भी किया। उनके पिता की इच्छा थी कि पार्वती भगवान विष्णु से शादी कर लें। लेकिन मां पार्वती के मन मंदिर में भगवान शिव बस चुके थे और इसलिए उन्होंने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और कठोर तपस्या शुरू कर दी। इस दौरान मां पार्वती ना तो कोई अन्न ग्रहण किया और ना ही जल ही ग्रहण किया। इसलिए यह माना जाता है कि इस व्रत में अन्न जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। मां पार्वती की कठोर तपस्या को देखकर भगवान शंकर उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

इस पावन पुनीत व्रत को मां पार्वती
भगवान भोलेनाथ को पति रूप में पाने के लिए तप कर रही हैं। लेकिन उनके पिता चाहते हैं कि पार्वती का विवाह विष्णु जी से हो जाए। इस पर उनकी उस सहेली ने माता पार्वती को वन में जाने कि सलाह दी। जिसके बाद माता पार्वती ने ऐसा ही किया और वो एक गुफा में जाकर भगवान शिव की तपस्या में लीन हो गई थी। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का बनाया और शिव जी की स्तुति करने लगी। पार्वती जी ने रात भर भगवान शिव का जागरण किया। इतनी कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को दर्शन दिए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। तबसे हरतालिका तीज मनाया जाने लगा। जो कुंवारी लड़किया इस व्रत को करती है उसे मनचाहा वर प्राप्त होता है। वहीं महिलाओं के पति की आयु लम्बी होती है।