shradh paksh 2019- श्राद्ध की हर तिथि में छुपा है राज, हर श्राद्ध से मिलता है खास आशीर्वाद

shradh paksh 2019- श्राद्ध की हर तिथि में छुपा है राज, हर श्राद्ध से मिलता है खास आशीर्वाद
shradh paksh 2019- श्राद्ध की हर तिथि में छुपा है राज, हर श्राद्ध से मिलता है खास आशीर्वाद

poonam soni | Updated: 13 Sep 2019, 07:42:52 PM (IST) Hoshangabad, Hoshangabad, Madhya Pradesh, India

- जानिए श्राद्ध तर्पण का अर्थ, महत्व, समय और प्रकार

होशंगाबाद/ पितरों का ऋण चुकाना एक जीवन में तो संभव ही नहीं, अत: उनके द्वारा संसार त्याग कर चले जाने के उपरांत भी श्राद्ध करते रहने से उनका ऋण चुकाने की परंपरा सालों से बनी हुई है। श्राद्ध से जो भी कुछ देने का हम संकल्प लेते हैं वह सब कुछ उन पूर्वजों को अवश्य प्राप्त होता है। श्राद्ध पक्ष सोलह दिन तक आश्विन मास की पूर्णिमा से अमावस्या तक रहता है। जिस तिथि में जिस पूर्वज का स्वर्गवास हुआ हो उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है जिनकी परलोक गमन की तिथि ज्ञान न हो, उन सबका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। शुक्रवार से पितरों के तर्पण की तिथि की शुरूआत हुई। लोगो ने सेठानीघाट नर्मदा में जाकर अपने पूर्वजों को जल तेल, भोजन का दान किया और पूर्वजों का तर्पण किया। आचार्य सोमेश परसाई के अनुसार आने वाले श्राद्ध में इन १६ तिथियों का अपना एक महत्व होता है। तो आइए जानते है कि क्या महत्व और विशेषता होती है।

जानते है इन तिथियों का महत्व
पूर्णमासी- आचार्य के अनुसार जो पूर्णमासी के दिन श्राद्धादि करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती। वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है।

प्रतिपदा- धन-सम्पत्ति के लिए होती है एवं श्राद्ध करनेवाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती।

द्वितीया- को श्राद्ध करने वाला व्यक्ति राजा होता है।
उत्तम- अर्थ की प्राप्ति के अभिलाषी को तृतीया विहित है।
चतुर्थी- शत्रुओं का नाश करने वाली और पाप नाशिनी है।
पंचमी तिथि- को श्राद्ध करने वाला उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति करता है।
षष्ठी तिथि- को श्राद्धकर्म संपन्न करता है उसकी पूजा देवता लोग करते हैं।
सप्तमी- को श्राद्धादि करता है उसको महान यज्ञों के पुण्यफल प्राप्त होते हैं और वह गणों का स्वामी होता है।
अष्टमी- को श्राद्ध करता है वह सम्पूर्ण समृद्धियां प्राप्त करता है।
नवमी- तिथि को श्राद्ध करने वाला प्रचुर ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलने वाली स्त्री को प्राप्त करता है।
दशमी- तिथि को श्राद्ध करने वाला मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त करता है।
एकादशी- का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है। वह समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कराता है। उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

किसे कहतें है तर्पण
पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की प्रक्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं। 'हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ सनातन यज्ञ को संपन्न करने वाले पितरों ने जैसे देहांत होने पर श्रेष्ठ ऐश्वर्य वाले स्वर्ग को प्राप्त किया है वैसे ही यज्ञों में इन ऋचाओं का पाठ करते हुए और समस्त साधनों से यज्ञ करते हुए हम भी उसी ऐश्वर्यवान स्वर्ग को प्राप्त करें।'

तर्पण का अर्थ
सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदों में श्राद्ध को पितृयज्ञ कहा गया है। यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता, पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह पितृयज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति और सन्तान की सही शिक्षा-दीक्षा से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है। वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं- (1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ। उक्त 5 यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। उक्त 5 यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृयज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।

श्राद्ध कर्म का समय
पितृयज्ञ या श्राद्धकर्म के लिए अश्विन माह का कृष्ण पक्ष ही नियुक्त किया गया है। सूर्य के कन्या राशि में रहते समय आश्विन कृष्ण पक्ष पितर पक्ष कहलाता है। जो इस पक्ष तथा देहत्याग की तिथि पर अपने पितरों का श्राद्ध करता है उस श्राद्ध से पितर तृप्त हो जाते हैं।
कन्या राशि में सूर्य रहने पर भी जब श्राद्ध नहीं होता तो पितर तुला राशि के सूर्य तक पूरे कार्तिक मास में श्राद्ध का इंतजार करते हैं और तब भी न हो तो सूर्य देव के वृश्चिक राशि पर आने पर पितर निराश होकर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।

श्राद्ध कर्म के प्रकार
नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिंडन, गोष्ठ, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा और पुष्टि।

तर्पण कर्म के प्रकार
पुराणों में तर्पण को छह भागों में विभक्त किया गया है- 1.देव-तर्पण 2.ऋषि-तर्पण 3.दिव्य-मानव-तर्पण 4.दिव्य-पितृ-तर्पण 5.यम-तर्पण 6.मनुष्य-पितृ-तर्पण।

श्राद्ध के नियम
श्राद्ध पक्ष में व्यसन और मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। पूर्णत: पवित्र रहकर ही श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। रात्रि में श्राद्ध नहीं किया जाता। श्राद्ध का समय दोपहर साढे बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना गया है। कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अन्न का अंश निकालते हैं क्योंकि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं।

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