इंदौर 4 विधानसभा क्षेत्र की अहम सीट पर भाजपा का 33 साल से 'राज' है। इस सीट पर 30 साल से एक ही परिवार के नेता विधायक बनते रहे हैं। पहले 1993 से 2003 तक लक्ष्मणसिंह गौड़ भाजपा विधायक रहे, वहीं इनके बाद उनकी पत्नी मालिनी गौड़ 2008 से अब तक विधायक हैं।
यहां कांग्रेस को आखिरी बार 1985 में जीत मिली थी। सबसे पहले इस सीट से जनता पार्टी के वल्लभ शर्मा (1977) चुनाव जीते थे। उसके बाद 1980 में वल्लभ शर्मा को हराकर कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर कब्जा जमा लिया, लेकिन भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय को उम्मीदवार बनाया। कैलाश ने कांग्रेस के विधायक को हराकर यह सीट हासिल की।
इसके बाद लक्ष्मण सिंह गौड़ लगातार 3 बार विधायक (1993,1998 और 2003) रहे, लेकिन उनकी दुर्घटना में मौत हो जाने के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी मालिनी गौड़ को इस सीट से प्रत्याशी घोषित किया। मालिनी गौड़ भी 3 बार इस विधानसभा सीट से जीतकर विधानसभा में पहुंच चुकी हैं। 2018 के चुनाव में इंदौर-4 सीट पर भाजपा की मालिनी लक्ष्मण सिंह गौड़ ने एकतरफा मुकाबले में कांग्रेस के सुरजीत सिंह चड्ढा को 43,090 मतों के अंतर से हराया था। इस सीट पर इसे सबसे बड़ी जीत के रूप में दर्ज किया गया था। इसके बाद कांग्रेस ने कई प्रयोग किए, लेकिन अब तक वह सफल नहीं हो सकी।
2018 के चुनाव में 11 उम्मीदवार थे मैदान में
2018 के विधानसभा चुनाव में कुल 2,63,644 मतदाता थे, जिसमें पुरुष 1,34,478 और महिलाएं 1,29,153 थीं। चुनावी मैदान में 11 उम्मीदवार थे, जिसमें भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों को छोड़कर अन्य उम्मीदवार को 1000 से ज्यादा वोट नहीं मिले। मालिनी गौड़ को 102,673 वोट मिले थे तो वहीं कांग्रेस के सुरजीत सिंह चड्ढा को 59,583 वोट मिले थे। मालिनी ने जीत दर्ज की थी।
इंदौर-4 को कहते हैं 'अयोध्या'
इंदौर-4 विधानसभा सीट भाजपा के लिए गढ़ बन चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के निवास भी इस विधानसभा सीट पर आते हैं। ऐसे में इसे 'अयोध्या' भी कहा जाता है। इस सीट पर 2 लाख 40 हजार से ज्यादा मतदाता हैं, जो दोनों ही पार्टियों की हार-जीत की तय करते हैं। इस सीट की खासियत यह भी है कि क्षेत्र में मात्र दो ऐसे वार्ड हैं, जो मुस्लिम बहुल इलाके हैं, लेकिन पिछले दिनों नगर निगम चुनाव में एक वार्ड में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी भाजपा को वोट देकर जिताया था।
आर्थिक-सामाजिक ताना बाना
विधानसभा में जातिगत समीकरण अहम किरदार निभाते हैं। इस क्षेत्र में ब्राह्मण और सिंधी समाज का प्रभुत्व है। यही दोनों समाज मिलकर इस सीट का निर्णय करते हैं। दोनों ही पाटियां दोनों ही समाजों को साधने का काम करती हैं। यहां पोरवाल, जैन, अग्रवाल व अन्य वैश्य वर्ग के लगभग 60 हजार मतदाता है, जबकि दूसरे नंबर पर सिंधी समाज के 55 हजार मतदाता हैं। मराठी मतदाताओं की संख्या भी करीब 35 हजार मतदाता है तो ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या भी लगभग 20 हजार है। इस विधानसभा के दो वार्ड मुस्लिम बाहुल्य हैं, जहां से मुस्लिम मतदाताओं की संख्या भी करीब 35 हजार है। इस सीट में व्यापारिक क्षेत्र भी आता है, जिसमें मप्र का सबसे बड़ा सराफा बाजार और कपड़ा मार्केट भी हैं। पिछले दिनों इस विधानसभा में मौजूद सराफा चौपाटी की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके है।