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नहीं आए घनश्याम घिर आई बदरिया…

दीपावली की सुबह होने वाले इस वार्षिक कार्यक्रम में आमतौर पर शास्त्रीय संगीत की महफिल सजती है...

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Diwali celebration,

इंदौर . दीपावली की सुबह यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में सुंदर सजा मंच और सामने सज-धज कर आए दर्शकों के चेहरे पर दीपावली का उल्लास, गजरों की महक और आनंदपूर्ण वातावरण में प्रारंभ हुआ सानंद न्यास की ओर से आयोजित कार्यक्रम दिवाळी प्रभात। दीपावली की सुबह होने वाले इस वार्षिक कार्यक्रम में आमतौर पर शास्त्रीय संगीत की महफिल सजती है पर इस बार मुंबई से आईं ख्यात नृत्यांगना शर्वरी जमेनीस ने अपनी शिष्याओं के साथ कथक की रसपूर्ण प्रस्तुति दी।

उन्होंने शुद्ध कथक भी पेश किया और बाद में थीम बेस्ड प्रस्तुतियों में कथक के साथ सुगम, फिल्म संगीत का फ्यूजन पेश किया। इस मोहक पेशकश ने दर्शकों की दीवाली की सुबह को और सुंदर और मधुर बना दिया। शर्वरी जमेनीस ने पूरी प्रस्तुति को दो भागों में बांटा। पहले उन्होंने अमृत गाथा पेश की, जिसमें मराठी के संत कवियों के लिखे अभंगों पर कथक की प्रस्तुति दी। सबसे पहले संत तुकाराम की रचना सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी....प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने शिष्याओं के साथ शुद्ध कथक पेश किया। इस समूह प्रस्तुति के बाद शर्वरी ने संत ज्ञानेश्वर की रचना घणु वाजे घुण घुण... पर एकल नृत्य किया। यहां उनके नृत्य में उनकी गुरु रोहिणी भाटे की झलक महसूस हुई। इसके बाद तुकाराम की रचना खेड़ा मांड््येला सहित कुछ और अभंग और संत ज्ञानेश्वर की प्रार्थना अता विश्वात्मके देवे...के साथ अमृतगाथा का समापन हुआ।

कवित्त और बैठक की ठुमरी
कथक में कवित्त का अलग ही महत्व है। इसमें छोटे-छोटे दोहों के माध्यम से बात कही जाती है जिसमें शब्दों का आवर्तन बेहद भावपूर्ण होता है। शर्वरी ने कवित्त पर छोटी, लेकिन प्रभावी प्रस्तुति दी। इनमें नित मंद बहे जमना..., और मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया ..जैसे कवित शामिल थे। कथक में बैठक की ठुमरी का भी चलन है, जिसमें नृत्यांगना बैठ कर ठुमरी के बोल पर अभिनय अंग से प्रस्तुति देती है। शर्वरी ने ठुमरी के बजाय एक कजरी चुनी, नहीं आए घनश्याम घिर आई बदरिया....। इसमें उन्होंने नायिका की विरह वेदना को अभिनय के साथ ढाल कर पेश किया।

आई होरी आई....
शर्वरी ने दूसरी प्रस्तुति को फुटप्रिंट नाम दिया। इसमें ५० के दशक की फिल्मों से हाल की फिल्म बाजीराव मस्तानी तक के उन नृत्य गीतों को पेश किया गया जिनमें कथक शैली का उपयोग किया गया है। इनमें शुरुआत कुछ होली गीतों से की जिनमें गाइड का गीत आई होरी आई....पिया तो से नैना लागे रे..., जा रे हट नटखट से लेकर बाजीराव मस्तानी का गीत मोहे रंग दो लाल...जैसे गीत शामिल थे। उन्होंने कथक एक और लोकप्रिय स्वरूप यानी मुजरा भी पेश किया, जिसमें मुगल-ए-आजम के गीत प्यार किया तो डरना क्या से लेकर पाकीजा का इन्हीं लोगों ने.... और उमराव जान का दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए...जैसे गीत शामिल थे। शर्वरी ने गीत जरूरी फिल्मों से लिए और फ्यूजन के बावजूद शास्त्रीयता के साथ तालपक्ष का ध्यान रखते हुए हर गीत को अलग तरह से कोरियाग्राफ किया।