
इंदौर. चिटफंड कंपनी गोल्डन फॉरेस्ट व उससे जुड़ी कंपनियों की लाखों- करोड़ों की जमीन की हेराफेरी के मामले में प्रशासनिक अफसरों ने जांच के बाद सिर्फ पटवारी को दोषी माना है। आरोप है कि बिना किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति के जमीन का बाले बाले नामांतरण कर दिया गया। पटवारी पर कार्रवाई के लिए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
गोल्डन फॉरेस्ट की जमीन के मामले में जिला प्रशासन की जांच चल रही है। हजारों लोगों से रुपए निवेश कराने के बाद गोल्डन फॉरेस्ट व उसकी कंपनी ईशर कंस्ट्रक्शन के नाम से वर्ष 1994-95 से 2001-02 के बीच महू व आसपास के कई गांवों में जमीन खरीदी गई थी। इस बीच कंपनी निवेशकों को पैसे नहीं लौटा पाई और संचालक फरार हो गए। कंपनी ने जिन जमीनों को खरीदा था उनका सरकारी रिकॉर्ड में नामांतरण ही नहीं हो पाया था जिसका फायदा उठाकर बदमाश मांगीलाल ठाकुर के साथ ही कंस्ट्रक्शन कंपनियों से जुड़े लोगों ने कब्जा कर लिया। काफी जमीनों का तो नामांतरण भी हो गया। प्रशासन ने भी जल्दबाजी दिखाते हुए वर्ष 2011 में कई जमीनों पर प्रशासन का कब्जा होने की रिपोर्ट भी बना ली।
वर्ष 2001-02 में यह जमीन बिना कोई सक्षम अधिकारी के आदेश से पुन: रिकॉर्ड में विक्रम कंस्ट्रक्शन के नाम से दर्ज हो गई। प्रशासन ने जांच में इसे गलत माना। तहसीलदार तपीश पांडे ने महू एसडीओ को भेजी जानकारी में इसके लिए तत्कालीन पटवारी किशोर सोनी को दोषी बताया है। लाखों-करोड़ों की जमीन के फर्जीवाड़े में एसटीएफ ने जो केस दर्ज किया उसमें राजस्व अधिकारियों को भी आरोपी बनाया है, ऐसे में सिर्फ पटवारी को दोषी ठहराने का मामला चर्चा में है।
पटवारी को एसडीओ ने दिया है नोटिस
तहसीलदार तपिश पांडे ने माना कि जांच में जमीन को नामांतरण के लिए पटवारी किशोर सोनी को दोषी माना है। उनका तर्क है कि पटवारी को रोस्टर होता है इस आधार पर उन्हें दोषी माना है। कार्रवाई शुरू कर एसडीओ ने उन्हें नोटिस देकर जवाब मांगा है।
Published on:
09 Oct 2017 08:17 pm
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