
'गोद लिए बच्चे को जैविक माता-पिता को अचानक सौंपना ठीक नहीं'
इंदौर. गोद दिए गए अपने बच्चे की वापस कस्टडी मांगने वाली जैविक माता-पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा, 12 साल के बच्चे को अचानक उसे पालने वाले से दूर कर देने से उसकी मन: स्थिति पर विपरीत असर पड़ सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई फैमिली कोर्ट में करने के निर्देश दिए। मामले पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस विवेक रूसिया ने कहा, फैमिली कोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई करने सहित बच्चों और परिजन की काउंसलिंग करने के लिए माकूल व्यवस्था की गई है, इसलिए हालिया मुद्दे पर पहले वहां सुुनवाई होना चाहिए। उन्होंने ऐसे असाधारण मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए फैसलों का भी हवाला दिया। द्वारकापुरी क्षेत्र में रहने वाले श्वेता और संदीप शर्मा (परिवर्तित नाम) ने याचिका दायर की थी। उनके तीन बच्चे हैं। 2007, 2009 और 2010 में उन्हें बच्चे हुए। 2009 में हुए दूसरे बेटे को उन्होंने श्वेता के भाई और भाभी को गोद दिया था, क्योंकि उन्हें बच्चे नहीं हो रहे थे। हालांकि 2020 में उनके घर भी बेटी ने जन्म लिया था। 2020 में पारिवारिक प्रॉपर्टी के विवाद के चलते दोनों परिवारों में दूरिया बढऩे लगी। मार्च 2021 में श्वेता और संदीप ने गोद दिए बेटे की कस्टडी वापस लेने के लिए कानूनी नोटिस जारी किया। फिर एसडीएम कोर्ट में केस लगाया। लेकिन कोर्ट 12 साल बाद अचानक बच्चे की कस्टडी दिलवाने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट में भी उन्हें राहत नहीं मिली। कोर्ट का मानना है कि बचपन से बालक जिसे अपने माता-पिता मानता है, उसे अचानक यह बताना कि उसके जैविक माता पिता कोई और हैं ठीक नहीं। इससे उसकी मन: स्थिति पर बुरा असर होगा।
Published on:
28 Mar 2022 04:39 pm

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