17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

ऐसी महिलाओं की कहानी, जिनका जीवन बीता संघर्ष में, अब जगा रहीं शिक्षा की अलख

पहले थोड़ी झिझक थी, लेकिन अब वे आदर्श हैं। उनको देख समाज की ऐसी 'मलाला' आगे आ रही हैं और पढ़ो-पढ़ाओ के नारे को साकार करने में जुटी हैं।

2 min read
Google source verification

image

Amit Mandloi

Aug 06, 2017

success story

उषा तिवारी

इंदौर. बचपन में कई तरह की चुनौतियों का सामना किया। समाज, परिवार से जो संघर्ष थे वह अलग। उन परिस्थितियों में कैसे पढ़-लिख पाईं, इस पर शायद किताब लिखी जा सकती है, लेकिन आज मन में ये ठाना है कि उन हालातों से किसी और को सामना नहीं करने देंगी। शिक्षा की अलख जगाने का जज्बा लेकर वे मैदान में उतर गई हैं। पहले थोड़ी झिझक थी, लेकिन अब वे आदर्श हैं। उनको देख समाज की ऐसी 'मलाला' आगे आ रही हैं और पढ़ो-पढ़ाओ के नारे को साकार करने में जुटी हैं। रुकावटें भी उनके आत्मविश्वास को देखकर चूर-चूर हो गई हैं।


ससुराल की प्रताडऩा से नहीं हारी हिम्मत, अब दूसरों के लिए प्रेरणा

वर्ष 1955 में मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद ही मेरी शादी हो गई थी, लेकिन ससुराल वाले दहेज के लालची निकले। पिता करीब डेढ़ साल बाद ही मुझे वापस घर ले आए। ससुराल वाले नहीं चाहते थे कि मैं आगे पढ़ूं, कुछ करूं, लेकिन माता-पिता ने मुझे पढ़ाया और उन्हीं की बदौलत काबिल बन पाई। 1965 में देवी अहिल्या कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी मिली। इसी कॉलेज में 1981 से करीब वर्ष 2000 तक प्रिंसिपल भी रही। बहुत से स्कूल-कॉलेजों में सलाहकार और डायरेक्टर रहने के बाद जगदाले स्कूल में प्राचार्य बनी। रिटायरमेंट के बाद भी जरूरतमंदों को पढ़ाने का सिलसिला जारी है। उन्हें सही रास्ता दिखाती हूं और जीवनभर यहीं कोशिश करती रहूंगी कि मेरी वजह से ज्यादा से ज्यादा लोग शिक्षित हो जाएं।

उषा तिवारी, सेवानिवृत्त प्राचार्य, उम्र - 79 वर्ष

IMAGE CREDIT: patrika

24 की उम्र में पति का देहांत, खुद पढ़ीं, बेटियों को बनाया इंजीनियर
वर्ष 1988 में मेरी शादी हुई थी, तब मैं बीए थी। मेरे पति चाहते थे कि शादी के बाद भी आगे पढूं, इसलिए उन्होंने 1991 में ही एमए समाजशास्त्र का फॉर्म भरा दिया। 1992 में कोर्स पूरा करने के बाद मैंने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन जीवन में संकट आया 1994 में। पति का अचानक देहांत हो गया। ऐसे मुश्किल समय में पहले बीएड, फिर एमए इंग्लिश लिटरेचर और एमबीए किया। बेटी कंचन और भावना को इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई। पति के जाने के बाद मेरे सास-ससुर और परिवार संबल बना। मैं जहां नौकरी करती हूं, वहां भी अकसर माता-पिता को बुलाकर उनकी काउंसलिंग करती हूं, ताकि वे अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर न छोड़ें।

मंदा मतई, प्रिंसिपल, सहोदय कॉन्वेंट स्कूल, देपालपुर, उम्र - 48 वर्ष


बड़ी खबरें

View All

ट्रेंडिंग