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चमत्कारिक है भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला प्रदोष व्रत, जानिए इसका महत्व और पूजन विधि

हिंदु धर्म में जितना महत्व एकादशी व्रत का है ठीक उतना ही महत्व प्रदोष व्रत का भी है।

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aaj ka panchang 20 december 2018 guruvar pradosh vrat katha

aaj ka panchang 20 december 2018 guruvar pradosh vrat katha

इंदौर। हिंदु धर्म में जितना महत्व एकादशी व्रत का है ठीक उतना ही महत्व प्रदोष व्रत का भी है। माह में दो बार यानी शुक्ल औश्र कृष्ण पक्ष की बारहवीं तीथि को या तेरहवीं तिथी को प्रदोष आता है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है जबकि प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए होता है। प्रदोष व्रत को भगवान शिव के महत्वशील व्रतों में से एक माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली स्त्री की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

मौन रहना चाहिए
प्रदोष व्रत प्रदोष काल में किया जाता है। सूर्यास्त के बाद सांयकाल के पहर को प्रदोष काल कहते है। मान्यता है स्त्री और पुरूष दोनों के लिए ही ये व्रत समान फलदायी होता है। जो भी प्रदोष व्रत कर रहा हो उसे प्रदोष काल में मौन रहना चाहिए क्योंकि भगवान शिव मौन रहकर ही अपनी तपस्या करते है। व्रत काल में भगवान शिव का पंचामृतों से संध्या के समय अभिषेक किया जाता है।

सोम प्रदोष से ही इसे शुरू करें व्रत
वैसे तो प्रदोष व्रत किसी भी दिन आए इसका महत्व वही होता है लेकिन सोमवार को आने वाले प्रदोष व्रत का पुराणों में विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा कहते है कि भगवान शिव ने कृष्णपक्ष में प्रदोष पर्व पर ही चंद्र को अपने मस्तक पर धारण किया था। इसलिए यदि आप उपासना के लिए पद्रोष व्रत करना शुरू कर रहे है तो सोम प्रदोष से ही इसे शुरू करें।

ये है व्रत की विधि
प्रदोष व्रत निर्जल किया जाता है। प्रदोष काल में स्नान कर साफ श्वेत वस्त्र पहन पूर्व दिशा में मुंह कर भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। सर्वप्रथम दीपक लगाएं और फिर प्रथम पूज्य गणेशजी का पूजन करें। इसके बाद भगवान शिव की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं और फूल, बिल्व पत्र चढ़ाकर पूजन करें और भोग लगाए। इसके बाद कथा और आरती करनी चाहिए।

ऐसे करें व्रत का उद्यापन
प्रदोष व्रत के उद्यापन व्रत की पूजा ठीक वैसे ही की जाती है जैसे व्रत की पूजा होती है। अंतर केवल इतना होता है कि उद्यापन वाले दिन हवन भी किया जाता है। पुराणों में लिखा है कि प्रदोष व्रत के उद्यापन में ऊं उमा सहित शिवाय नम: मंत्र का कम से कम १०८ बार उच्चारण कर आहुती देनी चाहिए। हवन के बाद आरती करे और पंडित को भोजन कराकर सपरिवार उनका आर्शिवाद लेने से व्रत का पूरा लाभ मिलता है।

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