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शिक्षक दिवस : एक स्टेशन मास्टर जिसने बदहाली में शिक्षा पूरी की, दिखा रहा बच्चों के कॅरियर को हरी झंडी

बदहाली में पला-बढ़ा ये युवा अब स्टेशन मास्टर है और युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करवा रहा है। पत्नी भी इसमें सहयोग कर रही हैं।

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संजय रजक@ इंदौर. मालवा मिल श्रमिक क्षेत्र की बस्ती गोमा की फैल का नाम लेते ही गरीब बस्ती, मजदूरों का मोहल्ला सामने आ जाता है। जो बदनाम थी, लेकिन अब इसका नाम धीरे-धीरे चमकने लगा है। यहां से निकले एक युवा ने मेहनत से जहां मुकाम पा लिया, वहीं वह अब अन्य युवाओं में शिक्षा की अलख जगा रहा है, उन्हें तरक्की- आगे बढऩे की राह दिखा रहा है। बदहाली में पला-बढ़ा ये युवा अब स्टेशन मास्टर है और युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करवा रहा है। पत्नी भी इसमें सहयोग कर रही हैं। दोनों ने लव मैरिज की है लेकिन इसके लिए उन्हें खूब पापड़ बेलने पड़े। समाज ने बहिष्कार कर दिया, अपने पराए हो गए लेकिन इन दोनों ने परवाह न की।

ये शिक्षक हैं राजू सैनी, जो आज रतलाम मंडल के बरलई में स्टेशन मास्टर हैं। ये उनकी मेहनत और लगन का नतीजा ही है कि गोमा की फैल, पंचम की फैल, कुलकर्णी का भट्ठा, जनता क्वार्टर्स, लाला का बगीचा जैसे श्रमिक क्षेत्र में आज करीब-करीब हर घर में एक सरकारी कर्मचारी है। 2002 में नेहरू पार्क के खुले मैदान में शुरू की गई कोचिंग में अब तक 1000 स्टूडेंट्स पढ़ कर गए और सरकारी सेवा में लग गए। ये नौजवान आज रेलवे, मप्र पुलिस, बैंक, आबकारी, मप्र सब इंस्पेक्टर, तहसीलदार, कस्टम विभाग आदि में नौकरी कर रहे हैं।

नेहरू पार्क में शुरुआत
वे बताते हैं कि नेहरु पार्क में जब क्लास शुरू की थी, जब वहां पर रिंकू यादव नाम का लडक़ा अखबार बेचने आता था। ओपन क्लास में वह भी आने लगा और आज वह प. रेलवे के परेल मुंबई में हेल्पर है। गोमा की फेल में रहने वाले रोहित वर्मा बचपन से ही नेत्रहीन हंै। सैनी सर की क्लास अटेंड की और मेहनत की, आज रतलाम मंडल में डीआरएम कार्यालय में अकाउंट विभाग संभालते हैं। जहां रिश्तेदारों ने मुहं मोड़ लिया, वहीं इदौर में समाज अध्यक्ष पुरुषोत्तम सैनी द्वारा सम्मानित किया है।

पढ़ते और दूसरे बच्चों को पढ़ाते
बकौल सैनी सर सन् 2002 में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी खुद भी शुरू की और दूसरे स्टूडेंट्स को भी पढ़ाना शुरू किया। राजस्थान का मूल निवासी हूं, इसलिए वहां की सामाजिक परंपराएं भी कुछ सख्त हैं। पढ़ाई के दौरान ही पिता ने मेरी शादी के लिए लडक़ी पसंद कर ली और शादी के लिए दबाव बनाने लगे। उस वक्त में 25 साल का था और नौकरी भी नहीं थी। ऐसे में कैसे नई जिम्मेदारी उठाता, इसलिए शादी के लिए मना कर दिया। पूरा परिवार एक ओर और मैं एक ओर। 2005 में सहायक स्टेशन मास्टर के लिए सिलेक्ट हो गया।

लव मैरिज की तो समाज ने ठुकराया, दंपती युवाओं को दे रहे मार्गदर्शन
सैनी ने बताया कि जिंदगी में एक समय ऐसा भी आया, जब समाज ने ही बहिष्कार कर दिया। सामाजिक कुरीतियों के चलते अपनों ने ही साथ छोड़ दिया, लेकिन सैनी ने हिम्मत नहीं हारी। जिम्मेदारी पूरी हुई तो घरवालों को रागिनी के बारे में बताया। रागिनी एससी से थी और मैं ओबीसी। जाति की दीवार खड़ी हो गई, घरवालों ने ये रिश्ता नकार दिया। जब वे नहीं माने तो लंबे इंतजार के बाद 2015 में हमने आर्य समाज में शादी कर ली। इस पर घरवालों ने ही बहिष्कार कर दिया। समाज की परवाह के चलते रिश्तेदारों ने आना-जाना बंद कर दिया। कुछ साल तक माता-पिता से भी बातचीत बंद रही, लेकिन आज वे राजी हैं। बाकी रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया है। रागिनी आज सेल टैक्स विभाग में हंै और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बच्चों को पढ़ा भी रही हैं।
योग्यता नहीं, घर देख चल देते- बकौल सैनी नौकरी लगते ही रिश्ते आने लगे। सभी गोमा की फैल में कच्चे मकान को देखकर लौट जाते, कोई भी मेरी योग्यता नहीं देखता। 2007 में कॉलेज की साथी रागिनी अजमेरा ने पीएससी क्लीयर की, मैं उससे शादी करना चाहता था। घर की जिम्मेदारी मुझ पर थी, इसलिए शादी का ख्याल नहीं किया। पहले छोटे भाइयों की शादी करवाई। चार भतीजों और भतीजी को पढ़ाकर मार्गदर्शन देकर सरकारी नौकरी तक पहुंचाया।