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खाने का संकट, घरौंदे भी उजड़ गए, प्रदूषण बना दुश्मन, इस क्षेत्र के गिद्ध करने लगे पलायन

जबलपुर जिले में गणना में दो वन क्षेत्रों में नहीं मिला एक भी गिद्ध  

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Giddh

Giddh

गिद्धों की संख्या और स्थिति
परिक्षेत्र-आवास स्थल-अवयस्क-वयस्क
कुंडम-05-03-31
सिहोरा-00-00-00
पाटन-12-24-29
शहपुरा-01-01-02
जबलपुर-00-00-02
बरगी-00-00-00
लुप्त हो रही प्रजातियां
बियर्डेड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, स्बेंडर बिल्ड, सिनेरियस वल्चर, किंग वल्चर, यूरेजिन वल्चर, लोंग बिल्ड वल्चर, हिमालयन वल्चर, ग्रिफिम वल्चर, जिप्सटेरनूईरोस्ट्रिस व वाइट बैक्ड वल्चर।

जबलपुर। शहरी क्षेत्र ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी गिद्धों के लिए भोजन और रहने का ठिकाना ढूंढऩा मुश्किल हो रहा है। गिद्धों को अब जिंदा रहने के लिए भी जतन करने पड़ रहे हैं। इस स्थिति में गिद्ध शहर से पलायन कर रहे हैं। गिद्धों की हुई गणना में चंद गिद्ध मिलने के बाद इसका खुलासा हुआ है। जबलपुर जिले के सिहोरा व बरगी क्षेत्र में गिद्धों का नामोनिशान नहीं मिला है। इस बात को लेकर वन्य प्राणी विशेषज्ञ भी हैरान हैं। गिद्ध को शेड्यूल वन में रखा गया है। यह पर्यावरण के इकोसिस्टम में एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। इसे विशेष पक्षी का भी दर्जा दिया गया है। जिले में गणना में मात्र 92 गिद्ध मिले हैं। जानकारों का कहना है कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ता प्रदूषण गिद्धों की कमी का मुख्य कारण है। साथ ही अंधाधुंध काटे जा रहे वृक्षों से भी गिद्धों का बसेरा छिन रहा है। यह पक्षी तेजी से विलुप्ति की कगार पर है।

गिद्ध पर्यावरण को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह मरे हुए प्राणियों का मांस खाता है। इससे सड़े मांस से होने वाली कई बीमारियों का संक्रमण नहीं फैलता है। इससे पर्यावरण का संतुलन भी बना रहता है। खाद्य शृंखला में इनका महत्वपूर्ण स्थान है, इन्हें सबसे ऊपर रखा जाता है। गिद्धों के संकट को इस बात से जाना जा सकता है कि जब वन विभाग की टीम स्थानीय वॉलटियर्स को लेकर सुबह 5 बजे जंगलों, पहाड़ों पर पहुंची तो बड़ी मुश्किल से गिद्द नजर आए। डुमना के जंगल से लेकर कटंगी, कैमोरी, निगरी, बरगी, बरही आदि क्षेत्रों में वृक्षों से लेकर पहाड़ी पर गिद्दों को तलाशा गया। आंखों से जब वे नहीं दिखे तो दूरबीन से देखा गया। गिद्ध समूह में न होकर टुकड़े में नजर आए। वन्य प्राणी विशेषज्ञ डॉ. एबी श्रीवास्तव ने बताया कि गिद्धों के खाने के लिए न तो अब जानवर मिल रहे हैं और न रहने के लिए उपयुक्त आवास है। मरे हुए जानवरों का चमड़ा व अन्य अंगों का निपटारा अन्य माध्यमों से हो रहा है। ऐसे में गिद्धों की संख्या लगातार कम हो रही है। वन्य प्राणी विशेषज्ञ शंकरेद्रु नाथ का कहना है कि मप्र, छग के साथ यूपी बिहार से गिद्ध एक तरह से गायब हो गए हैं। नदी नालों किनारे लोगों के बसने, शहरीकरण के चलते जानवरों के भोजन में दवाइयों का उपयोग हो रहा है। रसायनों के प्रयोग के चलते गिद्धों की संख्या में कमी आई है।