
ब्रह्मर्षि बावरा नर्मदा विद्यापीठ में दूर अंचल के बच्चों को दिया जा रहा है प्रवेश
जबलपुर । नर्मदांचल क्षेत्र के गरीब आदिवासी बच्चों को मुफ्त तालीम देकर उन्हें शिक्षित किया जा रहा है। यह शिक्षा ब्रह्मर्षि बावरा नर्मदा विद्यापीठ में दी जा रही है। एेसे बच्चों को शिक्षा के साथ उनके रहने के लिए छात्रावास भी दिया जाता है। इन बच्चों के अलावा ग्वारीघाट क्षेत्र के बच्चों को भी शिक्षा दी जा रही है। केजी से शुरू होने वाली इस स्कूल में बारहवीं कक्षा तक बच्चों को कौशल विकास और नैतिक ज्ञान की ओर अग्रसर किया जा रहा है।
गरीब और स्लम एरिया में रहने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ बच्चों के कौशल विकास की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यह प्रयास वर्ष 1998 से किया जा रहा है। ब्रह्मर्षि बावरा स्कूल में शुरूआती दौर में बच्चों को स्कूल लाने का प्रयास किया गया। इसके लिए बच्चों के पालकों से बातचीत कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया गया गया। लोगों को जागरूक करने से नतीजा यह सामने आया कि लोग अपने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजने लगे। इसके साथ नर्मदांचल क्षेत्र के ग्रामीण एेरिए से भी बच्चे आने शुरू हुए।
आदिवासी बच्चे आगे आए
जागरूकता से पालकों ने अपने बच्चे स्कूल भेजने शुरू किए। इनमें आदिवासी बेल्ट से शुरूआत रंग लाई और नैनपुर तक के बच्चे शिक्षा के लिए स्कूल आए। स्कूल के शुरूआत में बच्चों के रहने की व्यवस्था की गई ताकि वे एक जगह ही रहकर पढ़ सके। लगातार बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्कूल में हॉस्टल का निर्माण हुआ और मौजूदा हालात में इनकी संख्या ५५ पहुंच गई।
प्राइमरी अंग्रेजी फिर हिन्दी मीडियम
स्कूल में प्राइमरी तक पढऩे वाले बच्चे ज्यादातर ग्वारीघाट क्षेत्र के ही हैं। इसमें प्राइमरी तक बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दी जाती है। उसके बाद बच्चों को हिन्दी मीडियम में 12 वीं तक नि:शुल्क अध्ययन कराया जा रहा है। हॉस्टल में रहने वाले बच्चे आदिवासी या उस वर्ग के हैं, जिसमें पढऩा तो दूर पेट भर भोजन की भी परेशानी होती थी।
550 छात्र-छात्राएं
स्कूल में कुल 550 बच्चे अध्ययनरत हैं। इनमें लोकल बच्चों के साथ ग्वारीघाट, बरगी, शिकारा, घंसौर, नैनपुर सहित उसके ग्रामीण कस्बों के बच्चे शामिल हैं। इन बच्चों में छात्र-छात्राएं हैं। हॉस्टल सुविधा में बच्चों के रहवास के साथ उनके भोजन की भी नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है।
स्कूल के बाद भी बच्चों की मदद
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि कुछ होनहार एेसे भी बच्चे हैं, जो बारहवीं तक पढ़ चुके हैं। इसके बाद वे ट्रेनिंग ले रहे हैं लेकिन आर्थिक संकट की वजह से वे आगे बढऩे में कामयाब नहीं हो पा रहे थे तो स्कूल प्रबंधन ने एेसे बच्चों को नर्सिंग, इंजीनियरिंग आदि की ट्रेनिंग दिलवाने में मदद कर रहा है। स्कूल से पासआऊट होने वाले कुछ बच्चे अब रोजगार की दिशा की ओर अग्रसर हो गए हैं।
नौ बच्चों को सरकार की ओर से मदद
पछले दो वर्षों में बारहवीं कक्षा में अव्वल आने वाले नौ बच्चों को सरकार की ओर से आर्थिक मदद मिल रही है। इनमें वर्ष 2018 में 05 और वर्ष 2019 में 04 बच्चों के 85 प्रतिशत से अधिक आने पर चयन किया गया था। स्कूल प्रबंधन का दावा है कि इस वर्ष उम्मीद है कि स्कूल के काफी बच्चे सरकार की इस योजना का लाभ ले सकेंगे।
- विदेशों में भी है स्कूलस्कूल प्रबंधन के मुताबिक विश्व में 37सेंटर हैं। इसमें जबलपुर भी एक है। विदेशों में भी इस संस्था में भारतीय मूल के भी बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चों को हिन्दी का ज्ञान दिया जाता है।
- हुनरमंद बच्चों की तराशी जाती कला
स्कूल में हुनरमंद बच्चों की कला को तराशा जाता है। इसमें बच्चों को ड्राइंग, कॉफ्ट वर्क, राखी मेकिंग आदि सहित खेल में आगे बढ़ाया जाता है। स्कूल में हर दूसरे वर्ष खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
स्कूल में नि:शुल्क शिक्षा दी जा रही है। बच्चों को प्रवेश परीक्षा देनी पड़ती है। गरीब और आदिवासी बच्चों के लिए छात्रावास की सुविधा है। गरीब बच्चों की स्कूल के बाद भी मदद की जा रही है।
साध्वी मैत्री, प्राचार्य, ब्रह्मर्षि बावरा नर्मदा विद्यापीठ
Updated on:
04 Nov 2019 07:53 pm
Published on:
04 Nov 2019 12:10 pm
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