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गौ सेवा का ढोंग दिखावा, यहां सडक़ों पर एक्सीडेंट का कारण बनी गौ माता

सडक़ों पर चोटिल हो रहे, हादसों का भी बन रहे हैं कारणप्रशासन की नाकामी-पालकों की खुदगर्जी...समस्या बन गए गोवंश!

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cow special story

श्याम बिहारी सिंह@जबलपुर। निगम प्रशासन, नगर पंचायतों, ग्राम पंचायतों के तमाम दावों के बाद भी शहर की सडक़ों, हाइवे और खेतों में मवेशियों के झुंड नजर आ ही जाते हैं। इससे मवेशी खुद घायल होते हैं। आए दिन हादसों का कारण भी बनते हैं। फसलों को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। नगर निगम की हाकागैंग का दावा है कि वह मवेशियों को पकडकऱ गोशालाओं में पहुंचाती है। लेकिन, गोशालाओं में कम और सडक़ों पर ज्यादा मवेशी क्यों दिखते हैं, इसका जवाब जिम्मेदारों से देते नहीं बनता। हाका गैंग वालों से पशुपालकों के उलझने की शिकायतें भी आती हैं। कुछ पशुपालकों पर आरोप है कि वे दुधारू गायों को दूध निकालने के बाद आवारा छोड़ देते हैं। बाकी गोवंश तो उनके लिए किसी काम के रहते ही नहीं। यही हाल जिले की ग्रामपंचायतों के हैं। लोग अब गोवंशों को बांधकर रखने की सदियों पुरानी परम्परा भूल गए हैं। एक समय था, गोवंशों को आखिरी समय तक लोग अपने घर में रखते थे। लेकिन, अब सिर्फ दूध निकालने तक बात टिक गई है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि लोग गोवंश को अपनी जिम्मेदारी समझें, तो सारी समस्या हल हो जाए। साथ में प्रशासन आवारा मवेशियों को गोशालाओं तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाए।

बन रहीं गोशालाएं
सरकारी आंकड़े कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री गोसेवा योजना के तहत जिले में वर्ष 2019-20 में करीब 27 गोशालाएं स्वीकृत हुई थीं। उसमें 26 बन गई हैं। वर्ष 2020-21 में 42 गोशालाएं स्वीकृत हुईं। इनके निर्माण के लिए शासन से 16 करोड़ 70 लाख रुपए से ज्यादा का बजट स्वीकृत किया गया। शासकीय एवं अशासकीय गोशालाओं का निर्माण जिला पंचायत मनरेगा के माध्यम से कराती है। इसकी निर्माण एजेंसी सम्बंधित ग्राम पंचायत होती है। खुराक का इंतजाम पशुपालन विभाग करता है। विभाग चारा, भूसा और दाना की राशि जिला गोपालन एवं पशुधन सम्वर्धन समिति के माध्यम से देता है। प्रति गोवंश 20 रुपए प्रतिदिन के भोजन का प्रावधान है। गोपालन एवं संवर्धन बोर्ड के आंकड़ों की मानें, तो जबलपुर जिले में 82 गोशालाएं संचालित हैं। इनमें तकरीबन 4547 गाय और गोवंश हैं। लेकिन, प्रशासन और ग्रामीण समितियां गोवंश को गोशालाओं तक पहुंचा नहीं पा रहीं। शहर से लेकर हाइवे तक, खेतों में गोवंश के झुंड प्रशासन की नाकामी की पोल खोल रहे हैं।

एक तारीख जो याद आती है....

गाय और गोवंश से जुड़ी एक तारीख याद की जा सकती है। वह तारीख सात नवंबर 1966 थी। उस दिन दिल्ली में संसद भवन के सामने हजारों साधु-संतों की भीड़ जमा थी। प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। गृहमंत्री थे गुलजारी लाल नंदा। साधु-संत देश भर से वहां पहुंचे थे। साथ में अपनी गायें भी ले आए थे। साधु-संतों की मांग थी कि गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का कानून बनाया जाए। कुछ जानकारों के अनुसार स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास का वह सबसे पहला बड़ा आंदोलन था। हालांकि, यह समाज और परम्परा से जुड़ा मुद्दा था। सरकार और संतों के बीच बात नहीं बनी। यूं कहें, बात कुछ ज्यादा बिगड़ गई। पुलिस ने गोलियां चलाईं। कुछ की जान गई। कई घायल हुए। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन के सूत्रधार थे स्वामी करपात्री महाराज। उस आंदोलन को हुए लगभग 55 साल बीत गए। इतने साल में गोवंश का मुद्दा हमेशा जिंदा रहा। कई राज्यों में इसे लेकर कुछ नीति-निर्देश भी जारी हुए। मप्र में भी गोपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड वर्ष 2004 से प्रभावशील है। इसे बोर्ड रजिस्ट्रार फम्र्स एंड सोसाइटी में पंजीकृत किया गया है। संचालन के लिए राज्य स्तर पर जिला गोपालन एवं पशुधन संवर्धन समितियों का गठन किया गया है। सभी जिलों की समितियां भी पंजीकृत हैं। वर्तमान में गोपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड के अध्यक्ष हैं स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि।

जिले में शासकीय और अशासकीय गोशालाओं की संख्या पर्याप्त है। कई गोशालाओं को निर्माण कार्य चल भी रहा है। गोशालाओं में रखे जाने वाले गोवंशों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था पर्याप्त है। आम लोगों को भी चाहिए कि वे मवेशियों को गोशालाओं तक पहुंचाएं। यदि नहीं पहुंचा रहे हैं, तो निगम, नगर पंचायत, समितियों की टीम के जरिए भिजवाने की व्यवस्था करें। यह प्रशासनिक के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
डॉ. एसके बाजपेयी, उप संचालक, पशुपालन