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GOLD : आजादी से पहले ये खिलाड़ी ले आया था देश के लिए गोल्ड

गोल्ड आजादी से पहले ये खिलाड़ी ले आया था देश के लिए गोल्ड

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जबलपुर। देश को आजाद हुए एक ही वर्ष हुआ था कि 200 साल तक राज करने वाले अंग्रेजों से भारत के वीरों का सामना खेल मे मैदान में हो गया। इसमें गोल्ड मैडल दांव पर लगा था। सर्वसुविधाओं से प्रशिक्षित अंग्रेजी खिलाडिय़ों के सामने अभावग्रस्त भारतीय टीम के खिलाड़ी थे। मुकाबला शुरू हुआ और भारत के खिलाडिय़ों ने ब्रिटिश खिलाडिय़ों को धूल चटाकर हॉकी का पहला गोल्ड जीता। इसी कहानी पर आधारित अक्षय कुमार की फिल्म गोल्ड इस गणतंत्र दिवस पर रिलीज होने जा रही है। जिसका शहर के हॉकी प्रेमियों को बड़ी बेसब्री से इंतजार है। इसके गाने और मूवी को डाउनलोड करने विभिन्न साइटों पर सर्च किया जा रहा है।

हालांकि यह आजाद भारत का पहला गोल्ड था। इसके पूर्व ब्रिटिश शासन के झंडे तले भारतीय टीम गोल्ड जीत चुकी थी। आइऐ हम ऐसे ही खिलाड़ी से आपका परिचय कराते हैं। जिसने न केवल देश को गोल्ड दिलाया, बल्कि सबसे ज्यादा गोल भी किए हैं।


भारत में हॉकी की जब भी बात होती है तो हमारे मन में सबसे पहला ख्याल हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का आता है। हॉकी के इतिहास में सबसे ज्यादा गोल ध्यानचंद के ही नाम है। लेकिन एक खिलाड़ी और भी था जो शायद ध्यानचंद जितना मशहूर तो नहीं हुआ हो लेकिन खुद ध्यानचंद उन्हें अपने से बड़ा खिलाड़ी मानते थे। हम बात कर रहे हैं रूप सिंह की जिन्हें भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यानचंद के भाई नाम से जाना जाता है। जबलपुर में जन्मे और पले बढ़े रुप सिंह को दुनिया ने भले ही भुला दिया हो लेकिन संस्कारधानी के खिलाड़ी आज भी उन्हें हॉकी के दूसरे जादूगर के रूप में देखते हैं। यहां के हॉकी खिलाडिय़ों के मानस पटल पर वे अमर हैं। आइए, आपको भी रूप सिंह के जादू से अवगत कराते हैं -

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संस्कारधानी में हुआ जन्म
अपने जमाने के शानदार हॉकी प्लेयर रूप सिंह का जन्म 8 सितंबर 1908 को जबलपुर निवासी सोमेश्वर सिंह के घर पर हुआ था। मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे रूप सिंह ने अभावों के बीच हॉकी को अपना लक्ष्य बनाया और कुछ कर गुजरने की तमन्ना लेकर उसमें अपनी पूरी ताकत झोंक दी। एक दिन ऐसा भी आया जब हॉकी रूप से सिंह का सौंदर्य और पहचान बन गई। उन्हें हॉकी के जादूगर ध्यानचंद जैसा स्थान मिला। जमाना उन्हें ध्यानचंद के छोटे भाई के नाम से जानता था। हालांकि ध्यानचंद का भाई होना रूप सिंह के लिए एक हद तक बदकिस्मती जैसा भी बन गया। वे अधिकांशत: गुमनामी में ही रहे। जीवित रहते हुए और मृत्यु के बाद भी रूप सिंह को सिर्फ ध्यानचंद के भाई के नाम से ही जाना गया। हॉकी के शानदार लेफ़्ट इन खिलाड़ी रूप सिंह इस पर भी गर्व करते हुए दुनिया से चले गए।

दो बार दिलाया गोल्ड
जानकार बताते हैं कि रूप सिंह की स्टिक से निकले गोलों ने भारत को दो बार (1932 और 1936 में) ओलम्पिक का गोल्ड दिलाया। 1932 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स में ओलंपिक खेलों का आयोजन हो रहा था। ब्रिटिश झंडे तले भारत की टीम दूसरी बार मेडल झटकने के इरादे से ओलंपिक में उतर रही थी। ओलंपिक में ध्यानचंद को पहली बार टीम की कमान सौंपी गई। वहीं छोटे भाई रूप सिंह को पहली बार ओलंपिक टीम में शामिल किया गया।

नहीं थे पहनने को कपड़े
हॉकी प्लेयर सविता सिंह के अनुसार 1975 में वल्र्ड कप विजेता हॉकी टीम के सदस्य और ध्यान चंद के बेटे अशोक कुमार ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में रूप सिंह से जुड़ा एक मजेदार किस्सा बताया था। उन्होंने कहा था कि ''रूप सिंह ने लॉस एंजिल्स ओलंपिक टीम में चुने जाने पर भी वहां जाने से इंकार कर दिया था, क्योंकि उनके पास कपड़े नहीं थे। मेरे बाबूजी ने उन्हें अपने पैसों से कपड़े खऱीद कर दिए। उनका एक सूट सिलवाया तब जाकर वो अमेरिका जाने के लिए तैयार हुए।''

हासिल की एकतरफा जीत
लॉस एंजिल्स ओलंपिक में 4 अगस्त को पहले मैच में भारत ने जापान को एकतरफा मुकाबले में 11-1 से हराया। इस मैच में 4 गोल ध्यानचंद ने किए जबकि 3 गोल रुप सिंह की स्टिक से निकले। दूसरा मैच मेजबान 8 अगस्त को अमेरिका से था। भारत ने इस मैच में अमेरिका को उसी के दर्शकों के सामने 24-1 से धो डाला। ये एक गोल भी भारत ने अपने गोलकीपर रिचर्ड एलन की गलती से खाया था, जो मैच के बीच में ही दर्शकों को ऑटोग्राफ देने लगे थे।

और रूप सिंह ने ठोंके 10 गोल
लॉस एंजिल्स ओलंपिक में ध्यानचंद ने 8 गोल किए थे। लेकिन पहली बार ध्यानचंद को गोल ठोंकने में अपने भाई रूप सिंह से यहां मात मिली क्योंकि रूप ने 10 गोल ठोंके। अपने पहले ही ओलंपिक में 13 गोल करने वाले रूप सिंह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे और भारत दूसरी बार हॉकी में ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने में सफल हुआ। 1932 के ओलंपिक में भारत ने कुल 35 गोल ठोंके और महज 2 गोल खाए। यह अपने आप में एक इतिहास बन गया।

गोली की तरह निकलती थी गेंद
लॉस एंजिल्स ओलंपिक को 4 साल बीत चुके थे। इन चार में भारत ने 37 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले जिसमें 34 भारत ने जीते, 2 ड्रॉ हुये और 2 रद्द हो गये। इतने मैच खेलकर रूप सिंह के हाथों में बिजली जैसी तेजी आ गई थी, जिसकी वजह से गेंद उनकी स्टिक से लगकर गोली की तरह निकलती थी। जैसे-जैसे बर्लिन ओलंपिक नजदीक आ रह था वैसे-वैसे उनके खेल में धार बढ़ती ही जा रही थी। उनके शार्ट इतने तेज होते थे कि कई बार डर होता था कि उससे कोई घायल न हो जाए।

हर कोई रहता था बेताब
जानकारों के अनुसार 1936 बर्लिन ओलंपिक से पहले जर्मनी के अखबारों में जब भारतीय हॉकी के किस्से छप रहे थे और ध्यानचंद और रूप सिंह का खेल देखने के लिए पूरा जर्मनी बेताब हुआ जा रहा था। ध्यानचंद की कप्तानी में हॉकी टीम ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए जर्मनी के लिए रवाना हुई। बर्लिन ओलंपिक का आयोजन की तैयारियां जर्मनी ने बड़ी ही धूमधाम से की जा रही थी। ओलपिंक शुरू होने से 13 दिन पहले 17 जुलाई 1936 को जर्मनी के साथ भारत को प्रैक्टिस मैच खेलना था। इस मैच में भारत ने जर्मनी को 4-1 से हराया। इसके बाद भारत ने सबक लेते हुए ओलंपिक के लीग के पहले मैच में हंगरी को 4-0, फिर अमेरिका को 7-0, जापान को 9-0, सेमीफाइनल में फ्रांस को 10-0 से हराया और बिना गोल खाए हर किसी को हराकर फाइनल में पहुंचा था।