
Hari Prabodhini Ekadashi
वाराणसी. चार माह के शयन के बाद भगवान विष्णु सोमवार हरि प्रबोधनी एकादसी को जाग गए। ऐसे आज भगवान विष्णु और माता तुलसी की पूजा व विवाह के साथ ही मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे। भगवान विष्णु और माता आशीर्वाद से हर तरफ खुशी का माहौल होगा। करीब डेढ़ साल से ज्यादा वक्त से कोरोना के चलते वैवाहिक कार्यक्रमों में जो महज रस्मअदायगी शेष रह गई थी उसकी जगह अब लोग एक बार फिर से धूम-धाम से शादी-विवाह कर सकेंगे। इसे लेकर बैंडबाजा, कैटरर्स, लॉन संचालकों में खुशी का माहौल है।
हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी को हरि प्रबोधिनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। ये वही दिन है जब चातुरमास पूरा होता है और भगवान विष्णु चार महीने के शयन काल पूर्ण कर जागते हैं। इस मौके पर माता तुलसी का भगवान विष्णु संग विवाह होता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु सृष्टि का कार्यभार पुनः संभाल लेते हैं और इसके साथ ही सभी मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं।
वैसे भी सनातन हिंदू धर्म में एकादशी का महात्म्य बहुत ज्यादा है। भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी तिथि पर विधि- विधान से भगवान विष्णु की पूजा- अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता हैं कि एकादशी व्रत रखने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है।
हरि प्रबोधनी या देवउठावनी एकादशी कार्तिक, शुक्ल एकादशी 14 नवंबर को दिन में 9:00 बजे लग गई थी, जो 15 नवंबर सोमवार की सुबह 8:51 तक रही। ऐसे में उदया तिथि में सोमवार को एकादशी पड़ने के कारण सोमवार को ही हरि प्रबोधिनी एकादशी मनाई जा रही है। इस दिन व्रत रखने वाले व्रती जन मंगलवार 16 नवंबर को व्रत का पारण करेंगे।
देव उठावनी एकादशी पर सुबह ही नित्य कर्म से निवृत्त हो कर, स्नान-ध्यान के बाद घर के पूजन कक्ष में साफ-सफाई कर, खुद भी शारीरिक व आत्मिक पवित्रता के साथ दीप प्रज्वलित कर भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक कर पुष्प और तुलसी दल अर्पित किया जाता है। इस दिन व्रत रखने का भी बड़ा विधान है।
हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शालीग्राम अवतार और माता तुलसी का विवाह किया जाता है। इस दिन माता तुलसी और शालीग्राम भगवान की भी विधि- विधान से पूजा करन की मान्यता है। इस खास दिन को भगवान की आरती उतारी जाती है तथा प्रभु को सात्विक वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते। ऐसे में इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान किया जाता है।
हरि प्रबोधिनी एकादशी से ही मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे। इस दिन का हर किसी को शिद्दत से इंतजार था। ऐसा हो भी क्यों न, आखिरकार पिछले डेढ़ साल बाद ऐसा मौका आ रहा है, अन्यथा इन बीते डेढ़ साल में सहालग (शादी-विवाह के आयोजन) के तीन सत्र कोरोना संक्रमण के चलते एक तरह से खाली ही बीत गए। लोगों ने जैसे तैसे वैवाहिक आयोजन किए। इसका खास असर, बैंडबाजा, लॉन, कैटरर्स पर पड़ा। उनकी रोजी-रोटी मारी गई। लेकिन अब सभी उत्साहित हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस सहालग के सीजन में उनकी अच्छी कमाई होगी।
विवाह के शुभ लग्न
नवंबर-2021- 19,20, 21,28, 29 और 30
दिसंबर -2021- 12,7 और 12
Published on:
15 Nov 2021 01:33 pm

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