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जिस महाजन कमेटी की रिपोर्ट पर ओबीसी आरक्षण बढ़ाया, सुको ने उसे नहीं माना था

हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के खिलाफ तर्क    

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जबलपुर . मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के मसले पर सुनवाई मंगलवार को भी हुई । सामान्य वर्ग की ओर से ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के विरोध में तर्क प्रस्तुत किए गए। याचिकाकर्ता संगठन यूथ फॉर इक्वलिटी, धर्मेंद्र पांडे व अन्य की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने तर्क प्रस्तुत किया कि जिस महाजन कमेटी की रिपोर्ट के अधार पर मप्र सरकार ने ओबीसी का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया है, वो 1983 में आई थी। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने 1992 में उक्त कमेटी को नहीं माना था। इंद्रा साहनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना कि किसी भी दशा में कुल आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक सुदूर या मुख्यधारा से अलग क्षेत्रों में ही जनसंख्या के अधार पर आरक्षण सीमा बढ़ाई जा सकती है। तर्क दिया गया कि एमआर बालाजी, नागराज व मराठा प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा तय कर दी है, इसलिए उस सीमा के बाहर नहीं जा सकते। उन्होंने तर्क दिया कि कानून में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि ओबीसी को प्रदेश में 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है तो कुल आरक्षण 73 फीसदी हो जाएगा।

मामले में अब ओबीसी आरक्षण के समर्थन मे दायर 22 याचिकाओं की सुनवाई की जाएगी। इसके बाद सरकार की ओर से अंतिम बहस प्रस्तुत की जाएगी। सुनवाई के दौरान असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज नई दिल्ली से वर्चुअल हाजिर हुए। सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, ओबीसी के लिए नियुक्त विशेष अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व विनायक प्रसाद शाह उपस्थित हुए।