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बांधवगढ़ में धरोहरों का सर्वे, दो हजार साल पुरानी 40 गुफाओं का खुला राज

- वन्य प्राणियों की अनोखी दुनिया के बीच लुभाता है पुरावैभव - बांधवगढ़ को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के लिए पुरातात्विक प्रमाण जुटाने की कवायद शुरू हुई है। इस दिशा में पहली बार व्यवस्थित तौर पर प्रारम्भिक सर्वेक्षण कराया जा रहा है। चौंकाने वाले साक्ष्य सामने आए हैं।

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Survey of heritage in Bandhavgarh

Survey of heritage in Bandhavgarh

गोविंद ठाकरे
जबलपुर. बांधवगढ़ में दो हजार साल पुरानी गुफाओं की श्रृंखला है। ब्राम्ही लिपि के अभिलेखों के अलावा मंदिर, विशालकाय मूर्तियां और किलों की बुलंदियां अब भी हैं। सर्वेक्षण के दूसरे चरण में इन प्राचीन धरोहरों के डाक्यूमेंटेशन की प्रक्रिया जारी रहेगी। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद विशेष अनुमति से इनका संरक्षण कराए जाने की तैयारी है। ताकि, सैलानियों को वन्य प्राणियों की लुभावनी दुनिया के बीच प्राचीन वैभव गर्व की अनुभूति कराएगा। सूत्रों के अनुसार पार्क क्षेत्र में विशेषज्ञों की टीम ने घने जंगल में तमाम खतरों के बीच कई दिनों तक 40 से अधिक गुफाओं का सर्वे किया। ये बौद्ध गुफाएं हैं। इनमें ज्यादातर बौद्ध धर्म के हीनयान मत से सम्बंधित हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि बांधवगढ़ पार्क क्षेत्र में 100 से अधिक गुफाएं हो सकती हैं। वहां काफी संख्या में कुषाणकालीन ब्राम्ही अभिलेख मिले हैं। अब तक पांच बड़े मंदिरों का सर्वे हुआ है। ऊंचाई पर परकोटेदार किले हैं। मैदानी क्षेत्र में जंगल के बीच गुफाएं, मंदिर, अभिलेख और बड़ी प्रतिमाएं बिखरी हैं। प्रतिमाएं 20 फीट तक ऊंची हैं।
जुटाया जा रहा डाटा -विशेषज्ञों की टीम वैज्ञानिक तरीके से डाटा जुटा रही है। टीम में पुरातत्वविदों के साथ प्रचीन अभिलेख पढ़ने और छापा लेने वाले लिपि विशेषज्ञ, स्ट्रक्चरल इंजीनियर, केमिकल कंजरवेशन के वैज्ञानिक शामिल हैं। उन्होंने कई दिनों तक बारीकी से पुरा अवशेषों का अध्ययन किया। इस दौरान कई बार हाथियों के झुंड ने उन्हें एक-दो बार खदेड़ा भी। सर्वे की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर भारत सरकार के पुरातत्व विभाग को जल्द भेजी जाएगी।
स्वर्णिम अतीत
बांधवगढ़ प्रमुख रूप से टाइगर रिजर्व है, लेकिन इसकी समृद्ध पुरातात्विक पृष्ठभूमि भी है। पुराणों के अनुसार भगवान राम ने छोटे भाई लक्ष्मण को इसे उपहार में दिया था। बांधव का अर्थ भाई और गढ़ का आशय किला है। बांधवगढ़ का लिखित इतिहास ईसा पूर्व पहली शताब्दी का है। यह क्षेत्र लम्बे समय तक माघ शासकों के अधीन था। यहां भीमसेन के पुत्र महाराजा कौत्सीपुत्र पोथासिरी के विभिन्न ब्राम्ही शिलालेख मिले हैं। पोथासिरी सक्षम शासक थे। बांधवगढ़ उनकी राजधानी थी। उनके काल में ही यह खूब फली-फूली। मानव निर्मित गुफाओं से ब्राम्ही लिपि में कई शिलालेख मिले हैं, जो पहली शताब्दी ईसा पूर्व और बाद में इस क्षेत्र के महत्व को इंगित करते हैं। 5वीं शताब्दी में सेंगर राजवंश ने इस क्षेत्र पर शासन किया। उसके बाद कलचुरियों का शासन था। हैहय कलचुरियों के शासन को इस क्षेत्र का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। उन्होंने बांधवगढ़ जंगल के आसपास बड़ी संख्या में मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण कराया। शेषशायी विष्णु की विशाल मूर्ति और विष्णु, शिव आदि के अवतार की अन्य मूर्तियां कलचुरियों से ही सम्बंधित हैं।
एक्सपर्ट व्यू
- पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों ने बांधवगढ़ में सर्वेक्षण शुरू किया है। अभी और काम होना है। विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही बता पाएंगे क्या-क्या मिला है।
बीएस अन्नीगिरी, फील्ड डायरेक्टर बांधवगढ़ नेशनल पार्क
- प्रारंभिक सर्वेक्षण और डाक्यूमेंटशन का कार्य किया जा रहा है। विस्तृत सर्वेक्षण कर आकलन के बाद रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी जाएगी। वन विभाग के समन्वय से संरक्षण किया जा सकेगा।
डॉ शिवाकांत वाजपेयी अधीक्षण पुरातत्वविद, जबलपुर मंडल
सर्वेक्षण से साफ होगी तस्वीर
- शेषशायी विष्णु मूर्तिकला- यह मूर्ति बलुआ पत्थर पर उकेरी गई है। यह कलचुरी वंश से सम्बंधित है। इस मूर्ति के पास विशाल शिवलिंगम भी है। इस पर एक छोटी नरसिंह मूर्ति रखी गई है।
- गुफाओं की श्रृंखलाएं-जंगल के आसपास विभिन्न रॉक कट गुफा श्रृंखलाएं हैं। इनमें से कुछ गुफाएं पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व की हैं।
- शिलालेख-कुषाणकालीन ब्राम्ही शिलालेख के अलावा कलचुरी काल के शिलालेख भी ज्ञात हैं। ये शिलालेख गुफाओं के अंदर और मूर्तियों पर उकेरे गए हैं। बांधवगढ़ के शुरुआती शिला लेख लगभग पहली-दूसरी शताब्दी के हैं।