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दूध में मिलावट पर सरकार मौन, हाईकोर्ट ने लगाई दस हजार रुपए कॉस्ट

दो साल से जवाब न देने पर कोर्ट ने जताई नाराजगी

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जबलपुर. मप्र हाईकोर्ट ने प्रदेश में आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आने वाले दूध की शुद्धता निर्धारण के लिए उठाए जा रह कदमों की जानकारी के लिए राज्य सरकार को दो साल पहले जारी नोटिस का जवाब न मिलने पर नाराजगी जताई। एक्टिंग चीफ जस्टिस संजय यादव व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने अनावेदक राज्य व नगर निगम पर 10 हजार रुपए का जुर्माना (कॉस्ट) लगाया। साथ ही हर हाल में दो सप्ताह के अंदर जवाब पेश करने की ताकीद की गई।
यह है मामला
नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे ने जनहित याचिका दायर की है। इसमें कहा गया है कि नगरीय सीमा में बड़़ी संख्या में डेयरी संचालक, हॉकर व दुकानदार दूध बेचते हैं। अधिकतर दूध विक्रेता इसमें पानी व अन्य रसायन मिला कर बेचते हैं। मिलावटयुक्त दूध बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक है। जिले में बिकने वाला ९० प्रतिशत दूध बिना पैकेजिंग के बेचा जा रहा है। इसके चलते व्यापक पैमाने पर मिलावट का कालाधंधा किया जा रहा है। कहा गया कि भोपाल, इंदौर व ग्वालियर में ८० प्रतिशत से अधिक दूध पैक कर के बेचा जाता है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने लगातार मानीटरिंग के जरिए इस पर लगाम लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि सक्षम अधिकारी दूध विक्रेताओं के दूध का नमूना तो लेते हैं, लेकिन सम्बंधित कोर्ट में मामला पेश नहीं करते। इसलिए यह कारोबार फल-फूल रहा है।
यह है मांग
मिलावटी दूध का विक्रय बंद कराया जाए, बिना रजिस्ट्रेशन व लायसेंस के कोई भी व्यक्ति दूध का कारोबार न कर सके, लगातार दूध विक्रेताओं पर निगरानी रखकर दूध के सैम्पल लिए जाएं, जिनके सैम्पल में मिलावट पाई जाए, उन पर खाद्य अपमिश्रण अधिनियम के तहत कार्रवाई सुनिश्चित हो।