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कर्ज चुकाने न चुकाने पर हाईकोर्ट बोला – गरीबी कोई अपराध नहीं

कर्ज चुकाने न चुकाने पर हाईकोर्ट बोला - गरीबी कोई अपराध नहीं  

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poverty is not a crime

poverty is not a crime

जबलपुर. गरीबी कोई अपराध नहीं, जिसके पास चुकाने का कोई स्रोत नहीं, उसके खिलाफ धन डिक्री का हवाला देते हुए उसे जेल नहीं भेजा जा सकता। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट के जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने डिक्रीधारक को जेल भेजने के निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया। पीठ ने कहा, गरीबी के कारण डिक्रीटल राशि चुकाने में असमर्थता अपराध नहीं है।

कोर्ट ने कहा, निष्पादन न्यायालय निहित प्रावधानों का पालन करने में विफल रहा। क्योंकि नोटिस के बाद निष्पादन न्यायालय से डिक्रीधारक और निष्पादन आवेदन के समर्थन में पेश सबूतों को सुनने की उम्मीद की जाती है। इसके बाद कार्यकारी अदालत को जजमेंट देनदार को सुनवाई का अवसर देना होता है, ताकि वह कोर्ट को समझाने की अनुमति दे सके कि उसे सिविल जेल में क्यों भेजना चाहिए। अदालत ने टिप्पणियों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अंश दोहराया। जॉली वर्गीस मामले में शीर्ष कोर्ट ने कहा, दरिद्र नारायण की इस भूमि (गरीबी की भूमि) में गरीब होना अपराध नहीं है और किसी को जेल में डालने की प्रक्रिया से कर्ज वसूलना कानून का बहुत बड़ा उल्लंघन है, जब तक उसके पर्याप्त साधनों के बावजूद भुगतान करने में उसकी जानबूझकर विफलता की न्यूनतम निष्पक्षता का सबूत न हो।

यह है मामला

याचिकाकर्ता कर्जदार ने टीकमगढ़ की कोर्ट से पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कहा-मेरा व्यवसाय बंद हो गया। कर्ज चुकाने को कोई संपत्ति नहीं है। नौकरी कर रहा हूं। मानदेय से चुकाने की कोशिश करूंगा। प्रतिवादी ने कहा, उसने डिक्री से पहले संपत्ति पत्नी-बेटे के नाम कर दी। हाईकोर्ट ने पाया कि निष्पादन कोर्ट ने जांच से यह तय करने की जहमत नहीं उठाई कि याचिकाकर्ता के पास संपत्ति है या पत्नी-बेटों के नाम कर दी।