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नर्मदा में मोलस्का की मृत्यु, आस्था के साथ पर्यावरण के लिए खतरे की ‘जैविक चेतावनी’

जबलपुर। जीवनदायिनी नर्मदा के जल में छिपे सूक्ष्म जीव अब नदी की सेहत के बिगड़ते संकेतों को उजागर कर रहे हैं। जबलपुर और आसपास के घाटों पर पिछले तीन वर्षों से किए जा रहे वैज्ञानिक अध्ययन में मोलस्का घोंघे एवं शंख-सीप की 28 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। हालांकि, इनमें से 8 प्रजातियां अत्यंत दुर्लभ […]

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mollusks

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  • पानी की ऑक्सीजन में गिरावट, अत्यधिक जैविक अपशिष्ट, रासायनिक प्रदूषण और नदी-तल की संरचना में बदलाव बन रहे इनकी मौत का कारण
  • खोजी गई हैं 28 प्रजातियां, 8 अत्यंत दुर्लभ प्रजाति शामिल, नर्मदा को निर्मल रखने में करती हैं सहयोग

जबलपुर। जीवनदायिनी नर्मदा के जल में छिपे सूक्ष्म जीव अब नदी की सेहत के बिगड़ते संकेतों को उजागर कर रहे हैं। जबलपुर और आसपास के घाटों पर पिछले तीन वर्षों से किए जा रहे वैज्ञानिक अध्ययन में मोलस्का घोंघे एवं शंख-सीप की 28 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। हालांकि, इनमें से 8 प्रजातियां अत्यंत दुर्लभ हैं, लेकिन घाटों पर मिल रहे मृत मोलस्का के खोल वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। इसे नर्मदा के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक प्रारंभिक जैविक चेतावनी माना जा रहा है।

नदी के नेचुरल फिल्टर हैं शंख और सीप

शोधकर्ता डॉ. अर्जुन शुक्ला के अनुसार, मोलस्का की इतनी विविधता यह दर्शाती है कि नर्मदा का तल अभी भी जीवित है। विशेष रूप से शंख और सीप नदी के नेचुरल बायो-फिल्टर की तरह काम करते हैं। ये जल में मौजूद सूक्ष्म कणों और जैविक अपशिष्ट को छानकर पानी की पारदर्शिता बनाए रखते हैं। वहीं, घोंघे घाटों पर जमा होने वाली शैवाल को नियंत्रित करते हैं। यदि ये जीव नष्ट होते हैं, तो नदी की स्व-शुद्धिकरण क्षमता सीधे तौर पर प्रभावित होती है, जिससे अंतत: मछलियों और अन्य जलीय जीवन पर संकट गहरा जाता है।

जिलहरी और बरगी क्षेत्र में बढ़ता खतरा

अध्ययन के दौरान जिलहरी घाट और बरगी डैम के ऊपरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मृत मोलस्का पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थिति घुलित ऑक्सीजन में कमी, बढ़ते रासायनिक प्रदूषण और नदी-तल की संरचना में मानवीय हस्तक्षेप के कारण उत्पन्न हुई है। मोलस्का अत्यंत संवेदनशील होते हैं और जलीय तंत्र में किसी भी विषैले बदलाव का असर सबसे पहले इन्हीं पर दिखता है।

मानवीय गतिविधियां और पर्यावरणीय दबाव

शोध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि बड़े धार्मिक पर्वों और सामूहिक स्नान के दौरान नर्मदा पर दबाव अचानक बढ़ जाता है। पुष्प-मालाओं का विसर्जन और अन्य जैविक कचरा नदी के ऑक्सीजन संतुलन को बिगाड़ देता है। शोधकर्ताओं का कहना है जब मां नर्मदा मौन होती है, तब ये जीव बोलते हैं। अध्ययन में लैमेलिडेन्स मार्जिनलिस और बेलैम्या बेंगालेंसिस जैसी प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है, जो पोषक चक्र को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि समय रहते मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित नहीं किया गया और नदी के प्राकृतिक आवास को संरक्षित नहीं किया गया, तो ये अदृश्य रक्षक पूरी तरह विलुप्त हो सकते हैं। आस्था और परंपरा के साथ-साथ नदी के जैविक स्वास्थ्य का संरक्षण करना अब अनिवार्य हो गया है।

मोलस्का बहती नदी के लिए खतरे की घंटी है। इससे यह पता चलता है कि नर्मदा में घुलित ऑक्सीजन की कमी हो रही है। इसकी मुख्य वजह लोगों का आवागमन,प्रदूषण फैलाने वाली विसर्जन सामग्री आदि है। लोगों को जागरुकता का परिचय देना होगा, तभी नर्मदा को स्व‘छ और निर्मल रखा जा सकेगा।

  • डॉ. अजय खरे, पूर्व वैज्ञानिक, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड