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नए साल में महंगाई की मार, मप्र के इस शहर में मिलता है सबसे महंगा दूध

नए साल में महंगाई की मार, मप्र के इस शहर में मिलता है सबसे महंगा दूध  

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milk : अमूल दूध दो रुपए प्रति लीटर हुआ महंगा

milk : अमूल दूध दो रुपए प्रति लीटर हुआ महंगा

श्याम बिहारी सिंह@जबलपुर। मप्र में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन वाले शहरों में जबलपुर का भी नाम है। यहां से नागपुर जैसे शहरों में भी भारी मात्रा में दूध जाता है। इसके बाद भी शहर में दूध की औसत कीमत 60 रुपए प्रति लीटर है। महंगे चारे के नाम पर महंगा दूध बेचने वाली डेयरियां मनमाने अंदाज में व्यवसाय कर रही हैं। शहर में दूध डेयरियों पर बिल देने का चलन ही नहीं है। इससे दूध और दुग्ध उत्पादों में मिलावट आदि की शिकायत करने का कोई सबूत लोगों के पास नहीं रहता। दुग्ध व्यवसाय करने वालों के पास टैक्स चोरी का भी पूरा मौका रहता है।

नहीं मिलता पक्का बिल, शिकायत के लिए नहीं रहता सबूत
महंगे दूध वाले शहर में मनमाने अंदाज में चल रहे डेयरी काउंटर!

शहर में सांची के बूथ धीरे-धीरे गायब होते गए। अब तो सांची के उत्पाद खरीदने के लिए दूर तक का चक्कर लगाना पड़ता है। इसका फायदा दूध व्यवसायियों को भरपूर हो रहा है। शहर में दूध के रेट बढऩे का मामला कई बार अलग-अलग बिंदुओं पर अदालत तक भी पहुंच चुका है। तत्कालीन कलेक्टर्स को इस मामले को सुलझाने में पसीने भी छूटते रहे हैं। हालांकि, दूध के दाम डेयरी कारोबारियों के ही हिसाब से लगातार बढ़ रहे हैं। आम लोगों के पास कोई विकल्प नहीं होने से आखिर में दूधियों, डेयरियों के पास ही जाना पड़ता है। महंगा दूध और दुग्ध उत्पादन खरीदना मजबूरी है। खाद्य प्रशासन की टीम आए दिन मिलावटी पनीर, खोवा और गुणवत्ताहीन दूध जब्त करती है। यह तब होता है, जब टीम जांच करती है। यदि किसी ग्राहक को मिलावट या कम गुणवत्ता की शिकायत करनी हो तो, वह मामले को टाल जाता है। क्योंकि, उसके पास बिल नहीं होता।

जरूरत नहीं समझते
बिल नहीं देने को लेकर डेयरी काउंटर चलाने वालों से चर्चा की गई, तो ज्यादातर का कहना था कि इसकी खास जरूरत नहीं पड़ती। लोग बिल मांगते नहीं, इसलिए वे देते नहीं। वहीं, नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे का कहना है इसके लिए वे अदालत तक गए। लेकिन, गलती आम लोगों की भी है। आखिर उनके सहयोग के बिना दूध डेयरी काउंटर चलाने वालों पर दबाव कैसे बनाया जा सकता है? लोग जागरूक होंगे, तो डेयरी वाले बिल देने लगेंगे। साथ में प्रशासन पर भी दबाव बढ़ेगा। वे भी सिर्फ शिकायत आने का इंतजार नहीं करेंगे।

ग्राहकों की भी गलती
डेयरी से बिल नहीं दिए जाने के मामले में जानकारों का कहना है कि गलती आम ग्राहकों की भी है। कुछ संगठनों ने तो लाइसेंस और बिल को लेकर कोर्ट में मामला दायर किया था। वहां से डेयरी काउंटर वालों के खिलाफ फैसला भी आया। लेकिन, डेयरी संचालक कार्रवाई से इसलिए बच जाते हैं, क्योंकि उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता। प्रशासन भी अपनी तरफ से कार्रवाई नहीं करता। प्रशासन के जिम्मेदार इस आड़ में अपनी नाकामी छिपा जाते हैं कि उनके पास बिल नहीं दिए जाने की शिकायत ही नहीं आती। उधर, आम लोगों का कहना है कि वे झंझट में पडऩा नहीं चाहते। कौन रोज-रोज बिल मांगे। वहीं, घर तक दूध पहुंचाने वाले ‘भरोसे की खेती’ वाली कहावत पर व्यसाय करते हैं। लोगों का कहना है कि दूध की जांच करना आसान नहीं है। ऐसे में जो मिलता है, वही ले लेते हैं।उपभोक्ताओं के हित में काम करने वालों का कहना है कि ग्राहकों को जागरूक होना होगा। वे अपने अधिकारों को समझेंगे, तो भी व्यवसायी नियम-कानून से काम करेंगे। उपभोक्ताओं को लगता है कि बिल लेना चाहिए, तो उन्हें अधिकारपूर्वक डेयरी वालों से मांगना ही चाहिए।

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