
रेल यात्रियों के लिए बड़ी खबर: बोगी के सकरे दरवाजों पर सख्त हुआ हाईकोर्ट, हो सकता है बड़ा बदलाव
जबलपुर। ‘रेलवे की ट्रेनों की बोगियों में लगे दरवाजे कम से कम सौ साल पुरानी डिजाइन के हैं। इनकी डिजाइन बदलकर यात्रियों के अनुकूल की जाए अथवा ट्रेनों का स्टॉपेज समय बढ़ाया जाए।’ यह पीड़ा है हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश की, जिसे उन्होंने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर व्यक्त किया। ‘पत्रिका’ ने स्टेशन पर तहकीक ात की, तो इन तकलीफों से जूझते मिले यात्री। उन्होंने जज साहब का शुक्रिया अदा करते हुए रेलवे की बदइंतजामी का दर्द बयां किया।
ट्रेन की बोगियों के दरवाजे देश की 70 करोड़ आबादी के समय डिजाइन किए गए थे, अब हो गए दोगुने यात्री
नरसिंहपुर के विशाल पांडे ने बताया कि रेलवे की ट्रेनों का एक ओर का दरवाजा भी पूरा नहीं खुलता। इसके कम से कम एक फिट और खुलने की गुंजाइश हो सकती है। लेकिन दरवाजे के ठीक बगल में वाश-बेसिन बना दिया गया है। यह दरवाजे पूरा खुलने से रोकता है।
महिला डिब्बे की सूचना नहीं
महिला यात्रियों ने बताया कि महिला डिब्बों के सामने इसके बारे में स्पष्ट रूप से नहीं लिखा होता। इसी तरह दिव्यांगों के डिब्बे में भी बहुत कम ही दिव्यांग के लिए लिखा देखा गया। महिलाओं का कहना है कि महिलाओं के लिए डिब्बों की संख्या और बढ़ाई जानी चाहिए।
यात्री बोले शुक्रिया जज साहब! आपने वर्षों पुराना दर्द महसूस किया, रेलवे तो सुनता नहीं
बोगियों के दरवाजों को हर यात्री ने असुविधाजनक माना। इसके अलावा भी यात्रियों ने अन्य आम परेशानियां भी गिनाईं, जिनका उन्हें रोजाना सामना करना पड़ता है। कटनी अप-डाउन करने वाले सुरेश बंसल ने बताया कि उन्हें सामान्य बोगी से प्रतिदिन यात्रा करनी होती है। पैसेंजर ट्रेन को छोडकऱ अन्य ट्रेनों में इनकी संख्या कम होने के चलते सामान्य बोगियों के सामने ट्रेन रुकते ही भीड़ लग जाती है। महज दो-तीन फिट की चौड़ाई के दरवाजे से या तो यात्री उतर सकते है या चढ़ सकते हैं। एक बार में दो यात्री एक साथ गुजर सकें, इतनी जगह दरवाजों में नहीं है। इस वजह से उन्हें अक्सर धक्कामुक्की का सामना करना पड़ता है। कई बार तो इस परेशानी के चलते उनकी टेन छूट गई।
Published on:
25 Jan 2020 11:15 am
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