
kargil battle day
जबलपुर। 19 साल पहले कारगिल युद्ध में देश की सेना का पराक्रम हर किसी को याद है। देश की सेना ने दुश्मन को खदेड़ कर 26 जुलाई को बर्फ की सफेद चादर पर तिरंगा झंडा फहराया था। सेना की ताकत में शहर की आयुध निर्माणियों का भी अहम योगदान रहा। यहां बने वाहन और गोला-बारूद दुश्मन के लिए काल बने। ये सभी हथियार अब अपग्रेड हो गए हैं। यदि आज की स्थिति में कारगिल जैसी लड़ाई होती है तो ये दुश्मन के लिए ज्यादा घातक साबित होंगे। जिले की सैन्य प्रशिक्षण इकाइयों में भी सैनिकों को आधुनिक हथियारों और नई तकनीक से प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कारगिल युद्ध में वीर योद्धाओं ने 26 जुलाई को विजय हासिल की थी। इसलिए सैनिक इकाइयों में हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। इसमें देश की रक्षा में शहीद हुए जवानों के पराक्रम को स्मरण किया जाता है।
सैनिक प्रशिक्षण में भी परिवर्तन
कारगिल युद्ध में विजय दिलाने में शहर की ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों के साथ ही सैनिक प्रशिक्षण इकाइयों जम्मू एंड कश्मीर रायफल, दि ग्रेनेडियर्स रेजीमेंटल सेंटर और वन सिग्नल टे्रनिंग सेंटर की भी भूमिका रही। जानकारों के अनुसार वर्ष 2001 के बाद से टे्रनिंग सेंटर्स में सैनिकों के बुनियादी प्रशिक्षण में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है। यहां हथियारों के प्रशिक्षण के अलावा नई चुनौतियों से निपटने का भी प्रशिक्षण दिया जाता ह
बोफोर्स तोप का योगदान
ऊंची पहाडिय़ों पर बैठे दुश्मनों के दांत खट्टे करने में स्वीडन की 155 एमएम 39 कैलीबर बोफोर्स तोप का बड़ा योगदान रहा। गन कैरिज फैक्ट्री में इस तोप को अपगे्रड कर स्वदेशी वर्जन धनुष भी भी तैयार किया गया है। इतना ही नहीं, इसकी क्षमता मारक क्षमता भी 30 किलोमीटर से बढ़ाकर 40 किलोमीटर की गई है। यह पूरी तरह कम्प्यूटराइज्ड है। इसमें कई तरह के आधुनिक यंत्र भी लगाए गए हैं। सेना के पास उपलब्ध तोपों की मरम्मत के लिए 506 आर्मी बेस वर्कशॉप का भी आधुनिकीकरण किया जा रहा है। वीएफजे में बनने वाले वाहनों में भी बीएस-4 इंजन लगाए जा रहे हैं।
Updated on:
26 Jul 2018 02:17 pm
Published on:
26 Jul 2018 02:07 pm
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