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शिव भक्तों ने 10 हजार पौधों से पहाड़ी का कर दिया ‘श्रृंगार’, पेड़ बन लहलहा रहा जंगल, क्या आपने देखा

शिव भक्तों ने 10 हजार पौधों से पहाड़ी का कर दिया 'श्रृंगार’, पेड़ बन लहलहा रहा जंगल, क्या आपने देखा

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Shiva devotees

Shiva devotees

जबलपुर. संस्कारधानी के शिव मंदिरों में सावन मास में भोलेनाथ की भक्ति धारा बहती है। शहर के समीप मटामर गांव स्थित कैलाशधाम मंदिर शिव भक्तों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बन गया है। मनोरम व हरी-भरी वादियों के बीच ऊंची पहाड़ी पर विराजमान महादेव का दर्शन करने सावन मास में बड़ी संया में भक्त पहुंचते हैं। प्रत्येक सावन सोमवार को यहां शिवभक्तों का मेला लगता है। हर साल दूसरे सावन सोमवार को हजारों की संया में कांवड़िए भोलेनाथ का रुद्राभिषेक करने यहां पहुंचते हैं। एक कांवड़ में नर्मदा जल और दूसरे में पौधे होते हैं। जलाभिषेक के बाद पौधों को पहाड़ी पर रोप दिया जाता है। नतीजतन पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ी पर रोपे गए 10 हजार पौधे अब वृक्ष बनकर लहलहा रहे हैं।

ShivaBhakti मटामर पहाड़ी पर स्थित कैलाशधाम में सावन सोमवार को लगता है शिव भक्तों का मेला

ऐसे पहुंचें

मटामर गांव स्थित कैलाशधाम जबलपुर जिला मुयालय से 15 किमी दूर है। जबलपुर से कुंडम, निवास रोड पर स्थित है। यहां सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। रेल मार्ग से जबलपुर रेलवे स्टेशन व वायुमार्ग से डुमना विमानतल पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है।

भगवान परशुराम की तपोस्थली

विद्वानों के अनुसार मटामर गांव को भगवान परशुराम की प्राचीन तपोस्थली माना जाता है। यहां उनके चरणों से बना महामानव के पैरों के आकार वाला पवित्र परशुराम कुंड है। कुंड के समपी प्राचीन श्री परशुराम मंदिर, श्री परशुराम पर्वत व पर्वत के शिखर पर श्री परशुराम गुफा है। आचार्य जनार्दन शुक्ला ने बताया कि पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम लबे समय तक इस पवित्र स्थल पर तपस्यारत थे।

गौरीघाट से लाते हैं नर्मदा जल

दूसरे सावन सोमवार 29 जुलाई को भोलेनाथ का नर्मदा जल से जलाभिषेक होगा। कांवड़िए नर्मदा नदी के गौरीघाट व अन्य घाटों से जल लेकर कैलाशधम के लिए रवाना होते हैं। इसी जल से भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह कांवडिय़ों का स्वागत होता है। रामू दादा बताते हैं कि पहाड़ी पर कांवडिय़ों के लगाए करीब दस हजार पौधे अब वृक्ष बन गए हैं।

सफेद शिवलिंग के कारण कैलाशधाम पड़ा नाम

मंदिर के सेवक रामू दादा के अनुसार मटामर की पहाड़ी पर विराजमान सफेद पत्थर के ये शिवलिंग शताब्दियों से यहां हैं। दुर्गम स्थान होने के चलते यहां चरवाहे ही आया करते थे। 1985 में वे यहां शिवलिंग के दर्शन को आए तो यहीं के होकर रह गए। उन्होंने बताया कि सफेद शिवलिंग होने की वजह से पहाड़ी को कैलाश धाम नाम दिया गया। क्षेत्रीयजनों की मान्यता है कि इस शिवलिंग का दर्शन करने से ानसिक शांति मिलने के साथ मनोकामना भी पूरी होती हैं।