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महालक्ष्मी व्रत: आज इस तरह करें गजलक्ष्मी का पूजन, बरसेगा धन

मां गजलक्ष्मी के पूजन का मुहूर्त और विधि

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mahalaxmi poojan muhurt, time and vidhi

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जबलपुर। आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी मंगलवार को महालक्ष्मी की पूजा की जाएगी। प्रात: तर्पण के साथ निराहर व्रत रहकर महिलाएं कठिन तपस्या करेंगी। सोमवार की रात में महिलाओं ने व्रत का संकल्प लिया। अष्टमी के दिन प्रदोष काल में हाथी पर विराजमान गजलक्ष्मी यानी मां महालक्ष्मी की आराधना, उपासना की जाएगी। आचार्यों का मानना है कि मां महालक्ष्मी के इस व्रत को करने से संतान का कल्याण होता है एवं सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसे जीवित पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है।

16 का महामंत्र
ज्योतिर्विद जनार्दन शुक्ला ने बताया, कुछ महिलाएं भाद्र पद शुक्ल पक्ष अष्टमी को व्रत की शुरूआत करती हैं और 16 दिन व्रत पूर्ण होने पर आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी को महालक्ष्मी पूजन करती हैं। जबकि, ज्यादातर महिलाएं एक दिन निराहार व्रत रहकर सायंकल देवी लक्ष्मी का पूजा करती हैं। सायंकाल 16 दीप जलाकर वे 16 गठान का धागा बांधती हैं एवं सुनो सुनो लक्ष्मी महारानी सोलह बोल की एक कहानी... मंत्र को 16 बार पढ़कर पूजन करती है।

इस तरह करें पूजन
प्रात: काल स्नान करके तर्पण करें और भगवान सूर्य को अघ्र्य यानी जल अर्पित करें। इसके बाद दिन भर निराहार व्रत का संकल्प लें। व्रत के दौरान सदाचरण का पालन करें। संभव हो तो पूरा दिन ईश्वर के चिंतन में व्यतीत करें। शाम को सूर्योदय से पूर्व प्रदोष काल में यानी करीब ५.३० बजे मां महालक्ष्मी की गज पर आरूढ़ प्रतिमा को सिंहासन या लकड़ी के पटे या पात्र में स्थापित करें। ऊं गजलक्ष्मै नम: मंत्र के साथ मां को जल, अक्षत्र, पुष्प, कुमकुम, सिंदूर, रोली, श्रंगार, इत्र, वस्त्र, कमल पुष्प, ऋतु फल, मिष्ठान्न, धूप, दीप आदि अर्पित करें। इसके बाद सोलह दीपों से मां की आरती करें। संभव हो तो भजन कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करें और सुबह स्नान के साथ व्रत का पारायण करें। व्रत का पारायण शाम को मां के पूजन के बाद भी फलाहार के साथ किया जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पं. अखिलेश त्रिपाठी के अनुसार श्राद्ध पर्व की अष्टमी पर श्रद्धा पूर्वक पूजन करने और ब्राम्हणों को भोजन कराने से माता महालक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं और सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। अष्टमी के दिन माता महालक्ष्मी के पूजन से धनागम के रास्ते में आ रहे सभी अवरोध दूर हो जाते हैं। मां सभी प्रकार के अपराधों, दोषों और पापों का शमन कर देती हैं।

गांधारी ने किया था व्रत
जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल में रानी गांधारी ने मिट्टी के हाथी बनाकर जीवित पुत्रिका व्रत किया था। कुंती ने इसी व्रत को किया था, पूजन में इंद्रासन से एरावत हाथी आया था। उस समय से सुख समृद्धि एवं संतान की उन्नति के लिए महालक्ष्मी की पूजा की जा रही है।

खूब बिकी सामग्री
धार्मिक परम्परा के अनुसार घरों में महालक्ष्मी पूजन की सामग्री जुटाई गईं। व्रत की पूर्व संध्या पर ही हाथी एवं लक्ष्मी जी की प्रतिमा और पूजन सामग्री की दुकानें लग गई थी। इसके साथ श्रृंगार की सामग्री भी खूब बिकी। व्रत के लिए फल, मिष्ठान एवं पोहा खरीदे गए। शहर के बड़े फुहारा, मदन महल, छोटी लाइन फाटक, ग्वारीघाट, त्रिपुरी चौक, गढ़ा एवं विजयनगर क्षेत्र में लगी दुकानों में लोगों ने सामान खरीदें तो कॉलोनियों में भ्रमण करने वालों ने भी व्रत सामग्री जुटाने में भूमिका निभाई।