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इस किले में छिपा है कई टन सोना, तलाश के लिए खास है ये रात

मदनमहल किले से जुड़े हैं कई चमत्कारिक रहस्य, पूर्णिमा और अमावस्या को आज भी होती है खजाने की तलाश

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smallest fort in india

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जबलपुर। ग्रेनाइट की चट्टानों से आच्छादित मदन महल किले का अतीत गौरवशाली है। इसके कई रहस्य आज भी चर्चाओं में हैं। इन्हीं में शुमार है बड़ा खजाना और सोने की वह ईंट जिसकी तलाश में आज भी लोग यहां डेरा जमाए रहते थे। खजाने और सोने की ईटों की प्राप्ति के लिए अमावश्या व पूर्णिमा की रात को खास माना जाता है। शरद पूर्णिमा पर जब चांद अपने शबाब पर रहता है तब कई हाथ इसकी तलाश में जुटते हैं। जनश्रुति है कि कोई रहस्यमय साया सोने की ईंट की सुरक्षा करता है। इसी वजह से वह खजाना और सोनें की ईंटें आज तक किसी के हाथ नहीं लग पायी। किले की बनावट वॉच टॉवर जैसी है। इसकी नक्कासी आज भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। पूर्णिमा की रात को इसका आकर्षण और भी बढ़ जाता है। गुरुवार को शरद पूर्णिमा है। आईए इस उपलक्ष्य में किले से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं -

सोने की दो ईंट
इतिहासकार राजकुमार गुप्ता के अनुसार पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि एक विशाल चट्टान बने मदनमहल के किले के नीचे सोने की दो ईंटें दबी हुई हैं। इसके तलघर में खजाना भी है, जहां बेशुमार दौलत है। इसकी तलाश में लोगों का आना-जाना लगा रहता है। खजाने की तलाश में कई जगह खुदाई के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग ने किले को अपने संरक्षण में ले लिया है। कई रिसर्चर और विशेषज्ञों ने भी सोने की ईंटों की खोज के प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि खजाना और ये ईंटे आज भी शोध और खोज का विषय हैं।

पूर्णिमा की रात होती है खास
ज्योतिष व पुरातत्व के जानकार अरुण शुक्ल के अनुसार लोगों से पूछताछ में यह बात सामने आई है कि अमावस्या और पूर्णिमा की रात विशेषकर लोग महनमहल किले में आते हैं। पहले इनकी संख्या अधिक थी, लेकिन अब तादाद घटी है। यहां आने वाले लोगों का तर्क यह था कि वे अमावस्या पर साधना करते हैं, जो पूर्णिमा को सार्थक होती है। शरद पूर्णिमा पर चन्द्रमा अपने उच्चतम स्तर पर रहता है। इसलिए खजाने की खोज के लिए इस रात को चुना जाता है।

सुरक्षा करता है रहस्यमय साया
किले के समीप ही रहने वाले गजेन्द्र दुबे और प्रहलाद कहार की मानें तो एक रहस्यमय साया आज भी खजाने की रक्षा करता है। उस साये की वजह ही अब तक कोई सानें की ईंटें व खजाना हथियाने में सफल नहीं हो पाया। जनचर्चा है कि किले में कई बार रहस्यमय साये को भटकते हुए देखा गया है। पहले तो रात होते ही यहां तरह-तरह की डरावनी आवाजें भी आती थीं। जिसकी वजह से लोग रात में यहां डरते हैं। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है ये नही कहा जा सकता। क्योंकि पहाड़ पर होने की वजह से यहां आपराधिक तत्वों का जमावड़ा रहता है। अब यह छेडख़ानी और नशाखोरी के अड्डे में भी तब्दील हो चुका है।

कई किलोमीटर की सुरंग
इतिहासकार बताते हैं कि मदनमहल किले के अंदर एक गुप्त सुरंग है जो सीधे मंडला में जाकर निकलती है। यहां से रानी आना-जाना करती थी। ये सुरंग अब बंद हो चुकी है। बताया जाता है कि किले के बाहर एक परिसर पर एक विशाल पत्थर से सुंरंग का हिस्सा ढंका हुआ है। कभी यह सुंरंगखुली हुई थी, इस पर कभी रिसर्च नहीं हुई।

रानी करती थी युद्धाभ्यास
मदन महल किले को वैसे तो रानी दुर्गावती के वॉच टॉवर या सैनिक छावनी के रूप में जाना जाता है। जहां से वे पूरे शहर पर वह आसानी से नजर रखती थीं। यहां भारी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं रखी जाती थीं। किले में रानी की यादें अब भी बसी हुई हैं। वह पत्थर आज भी मौजूद है जिस पर दुर्गावती अपने घोड़े पर बैठकर किले के नीचे छलांग लगाकर युद्ध का अभ्यास करती थीं। इस किले में कुछ रहस्य समाए हुए हैं जो आज भी अनसुलझे हैं।

मां शारदा का मंदिर
किले से एक रास्ता पहाड़ी पर बने शारदा मंदिर की ओर जाता है। जहां से रानी स्वयं माता के पूजन के लिए जाया करती थीं। मंदिर में सावन मेला और ध्वजा चढ़ाने प्रथा उन्होंने ही यहां शुरू की थी। जो कि चार सौ साल से बदस्तूर जारी है।

सीताफल के बाग
एक समय पहाड़ी खूबसूरत वृक्षों से आच्छादित थी। यहां सीता फल के बगीचे थे, जो पूरे देश में प्रसिद्ध थे। यहां जंगल में चीते, शेर और जंगली जानवर भी थे। हालांकि सैनिक छावनी होने की वजह से यहां सख्त पहरा होता था। और परिंदे को भी यहां पर मारने की इजाजत नहीं थी।

अनूठी गुफाएं
मदनमहल पहाड़ी अनूठी शिलाओं के लिए प्रसिद्ध तो है ही, यहां कुछ गुफाएं भी हैं। एक गुफा पिसनहारी की मढिय़ा के आगे है, जो अंदर ही अंदर बद्रीनाथ के शिखर पर निकलती है। यहां पत्थरों को काटकर बनाई गई करीब एक दर्जन गुफाएं हैं, जिनका रहस्य आज भी रहस्य ही है।

कैसे पहुंचे
मदनमहल का किला जबलपुर रेलवे स्टेशन से करीब ५ किलो मीटर और मदनमहल रेलवे स्टेशन से करीब 2 किलोमीटर दूर, मदनमहल की पहाड़ी पर बना है। दीनदयाल चौराहा स्थित अंतरराज्यीय बस टर्मिनस से भी इसकी दूरी करीब ६ किलोमीटर है। टैक्सी, ऑटो या निजी वाहन पर यहां किसी भी समय आसानी से आया व जाया जा सकता है। चारों तरफ हरियाली और ग्रेनाइट की चट्टानें हैं। कई गुफाएं भी हैं, जो आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां सुबह या फिर शाम को सूर्यास्त के समय का नजारा अद्भुत रहता है। विशेषकर पूर्णिमा की रात को इसका वैभव देखने लायक होता है, लेकिन यहां सुरक्षा का अभाव है। ऐसी स्थिति में यहां परिवार के साथ या दो-चार मित्रों के साथ जाना ही उचित व सुरक्षित है।

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