
dialysis machine
जबलपुर. नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में नैफ्रोलॉजी शुरू होने के बाद भी किडनी के मरीजों की परेशानी समाप्त नहीं हो रही है। हॉस्पिटल में मरीजों को बेहतर सुविधा देने के लिए डायलिसिस की एडवांस यूनिट स्थापित की गई है। सपोर्टिंग सिस्टम अधूरा होने से छह महीने से करोड़ों रुपए की 18 डायलिसिस मशीनें धूल खा रही हैं। मरीजों की जांच और उपचार शुरू हुए करीब आठ माह बीत चुके हैं। ओपीडी में प्रतिदिन भीड़ बढ़ रही है, लेकिन डायलिसिस यूनिट शुरू नहीं होने से कई गरीब मरीजों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है। मेडिकल कॉलेज में डायलिसिस कराने पहुंच रहे मरीज भटक रहे हैं।
ड्राइंग-डिजाइन में चूक से बिगड़ी बात
सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में मशीनों और उपकरणों के इंस्टॉलेशन के दौरान ड्राइंग-डिजाइन में खामी सामने आयी है। जानकारों के अनुसार केंद्र सरकार की इस योजना के लिए दिल्ली से अधिकारियों ने ड्राइंग-डिजाइन फायनल की। इसके अनुरुप जो कंस्ट्रक्शन कराया गया उसमें सिर्फ 18 डायलिसिस बेड लगाने की जगह बनाई गई। जबकि, डायलिसिस यूनिट के लिए 30 बेड भेजे गए। बिल्ंिडग में जगह नहीं होने से 12 मशीने इंदौर भेज दी गई। डायलिसिस यूनिट के साथ रीप्रोसेस यूनिट, वाटर ड्रेनेज और प्रोसेस बायोकॉर्बेट मशीन की व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है। आधे-अधूरे यूनिट के कारण डायलिसिस मशीनें शो पीस बनकर रह गई हैं।
मेडिकल में खराब मशीनों से परेशानी बढ़ी
मेडिकल कॉलेज में डायलिसिस के लिए पांच बेड हैं। इसकी दो मशीनें लम्बे समय से बंद हैं। बाकी तीन मशीनों में भी दो के आरओ प्लांट के पैनल कुछ दिन से खराब हैं। सिर्फ एक बेड पर ही डायलिसिस हो रही है। इससे डायलिसिस के लिए वेटिंग बढ़ रही है। कुछ मरीज निजी अस्पतालों में मोटी फीस देकर डायलिसिस करा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के अनुसार सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में डायलिसिस यूनिट में 18 मशीनें हैं। इससे सम्बंधित कुछ व्यवस्थाओं के लिए पत्राचार किया जा रहा है। जल्द ही जरुरतों का पूरा कर लिया जाएगा। मरीजों को जल्द से जल्द से डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों की अनदेखी
केंद्र सरकार की योजना के तहत सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल बनाया गया है। प्रदेश में सरकार बदलने के बाद हॉस्पिटल के अधूरे कार्यों को पूरा करने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। हॉस्पिटल में नैफ्रोलॉजी विभाग के जिम्मेदारों की ढिलाई भी डायलिसिस यूनिट के संचालन पर भारी पड़ रही है। वहीं, जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से केंद्र के अधिकारियों पर दबाव नहीं बन पा रहा है। दिल्ली के अधिकारियों की मनमानी से डायलिसिस यूनिट का काम लगातार पिछड़ रहा है।
150 करोड़ रुपए का सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
50 करोड़ रुपए के उपकरण (नैफ्रोलॉजी सहित अन्य विभागों के)
30 डायलिसिस मशीनें सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में आयीं थीं।
12 मशीनें बाद में इंदौर सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल भेज दी गईं।
18 मशीनें सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में फिलहाल लगाई गई हैं।
06 महीने से ज्यादा समय होने के बावजूद यह मशीनें शुरू नहीं हुई।
05 डायलिसिस मशीनें मेडिकल कॉलेज में हैं। इनमें चार खराब हैं।
10 मरीज अभी डायलिसिस के प्रतिदिन मेडिकल में आते हंै।
04 मरीजों का अधिकतम अभी एक दिन में डायलिसिस हो पा रहा है।
15 से ज्यादा मरीज औसतन प्रतिदिन नैफ्रोलॉजी की ओपीडी में आते है।
02 हजार रुपए औसतन निजी अस्पताल में एक बार डायलिसिस का शुल्क।
04 हजार से ज्यादा किडनी रोगी, सप्ताह में एक से दो दिन डायलिसिस की जरूरत
Published on:
17 Feb 2020 12:05 pm

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