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इस देवी प्रतिमा को अपने आप निकलता है पसीना, भक्तों ने लगवाए एयर कंडीशनर

गोंडवाना शाासनकाल में हुई थी प्रतिमा की स्थापना, परिसर पर रात में रुकने पर है मनाही

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kali mandir sadar jabalpur

kali mandir sadar jabalpur

जबलपुर। वासंतेय नवरात्र पर हर तरफ मां जगद्जननी के नाम की धूम है। कहीं अनुष्ठान, आरती-वंदन, तो कहीं सप्तसती पाठ आदि के माध्यम से देवी की उपासना, आराधना की जा रही है। माता को जल अर्पित करने के लिए देवी मंदिरों में कतारें लग रही हैं। इस बीच हर बार की तरह इस बार भी जबलपुर के सदर स्थित प्राचीन काली माई मंदिर आकर्षण का केन्द्र है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजन वंदन के लिए पहुंच रहे हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थापित काली माता की प्राचीन प्रतिमा पर गर्मी में अपने आप पसीना निकलने लगता है। माता को पसीना नहीं निकले इसलिए भक्तों ने मंदिर में बकायदा एसी लगवा दिए हैं, जो हमेशा ऑन रहते हैं।

साढ़े 500 साल प्राचीन
सदर निवासी धनंजय वाजपेयी के अनुसार लगभग 550 साल पुरानी काली माता की भव्य प्रतिमा गोंडवाना साम्राज्य के दौरान स्थापित की गई थी। बताया गया है कि मंदिर में श्रंगार के वक्त जब एसी बंद होते हंै तो मां की प्रतिमा पर अपने आप पसीने जैसी बूंदे उभर आती हैं। पसीने के ये बूंदें नहीं आएं, इसलिए मंदिर में एयर कंडीशनर लगवा दिए गए हैं। पसीना निकलने के कारणों की अनेक बार खोज भी की गई है, लेकिन किसी को कुछ समझ में नहीं आया। लोग इसे चमत्कार जैसा मानते हैं।

टस से मस नहीं हुईं माता काली
सदर निवासी वयोवृद्ध एसके गुप्ता के अनुसार बुजुर्ग बताते थे कि रानी दुर्गावती के शासनकाल में मां शारदा और काली की मूर्ति को बैलगाड़ी पर मंडला से जबलपुर लाया गया था। इन दोनों प्रतिमाओं को मदनमहल पहाड़ी पर स्थापित किया जाना था। राता होने की वजह से बैलगाड़ी चालक ने दोनों प्रतिमाओं को सदर बाजार (वर्तमान स्थल) पर बैलगाड़ी उतार दिया। वह रात्रि विश्राम के लिए घर चला गया। सुबह आकर उसने दोनों प्रतिमाओं को फिर से बैलगाड़ी पर रखने का प्रयास किया। इस दौरान मां शारदा देवी की प्रतिमा तो उठ गई, लेकिन काली माता की मूर्ति उस स्थान से टस से मस नहीं हुई। लोगों ने खूब प्रयास किए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बाद में क्षेत्रीय जनों ने प्रतिमा को यहीं पर स्थापित कराने का निर्णय लिया। उस समय से प्रतिमा यहीं विराजमान है। पहले प्रतिमा पीपल के वृक्ष के नीचे थी। अब वहां भव्य मंदिर बन गया है। नवरात्र पर यहां विशेष अनुष्ठान होते हैं। हजारों की संख्या में लोग इममें भागीदार बनते हैं।

पहाड़ी पर है दूसरी प्रतिमा
मदन महल किले के समीप पहाड़ी पर विराजित मां शारदा देवी की प्रतिमा उसी समय की है। बताया जाता है कि काली माता की प्रतिमा को सदर में ही छोडकऱ इस प्रतिमा को मदनमहल की पहाड़ी पर लाया गया। यहां इनकी विधि विधान से स्थापना करायी गई। मदन महल स्थित शारदा देवी मंदिर में भी भक्तों का मेला लगता है। सावन में तो यहां देवी मां को इतने ध्वज चढ़ाए जाते हैं कि पूरी पहाड़ी लाल दिखने लगती है।

पसीना बना रहस्य
क्षेत्रीय जनों के अनुसार देवी प्रतिमा को पसीना आने की रहस्मय घटना की कई बार जांच कराई गई। आर्किलॉजी से जुड़े प्रो. अरुण शुक्ला के अनुसार मां काली की प्रतिमा विशेष प्रकार के पत्थर से बनी हुई है। इसमें पसीने जैसी पानी की बूंदें कहां से आ जाती है, यह रहस्य समझ में नहीं आया। हो सकता है कि पत्थर की कोई अपनी खासियत हो, लेकिन भक्तों ने इसे माता का चमत्कार मान लिया है। यही कारण है कि मंदिर के हाल में एसी लगवा दिए गए हैं। ताकि गर्मी में माता को पसीना नहीं आए। यह सच है कि गर्मी में प्रतिमा पर पसीने जैसी बूंदों का आना हैरान करने वाला है। प्रतिमा पर तैलीय पदार्थों आदि की भी जांच की गई, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। यह आस्था से जुड़ा विषय है।


लगता है मेला
सदर की मां काली की एसी वाली गाथा जो भी सुनता या पढ़ता है, वो उनके दरबार में जरूर दर्शन करने आता है। नवरात्र के समय मां काली के दर्शन लाभ लेने के लिए जबलपुर सहित कई जिलों के भक्त यहां आकर अपनी मनोकामना पूर्ण होने की उनसे अर्जी लगाते है। यहां जो भी अपनी मनोकामना लेकर एसी वाली माता के पास आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। यही वजह है कि माता के मंदिर में तडक़े सुबह से ही भक्तों की भीड़ का सिलसिला देर रात तक रहता है।

रात में माता का फेरा
मंदिर प्रबंधन के अनुसार यहां माता की मौजूदगी पूरे समय बनी रहती है, इसलिए रात को मंदिर परिसर पूरी तरह से खाली करवा दिया जाता है। रात को कोई भी मंदिर में नहीं रुकता है। मंदिर के सामने स्थित प्रसाद व पूजन सामग्री की दुकानें भी करीब दो सौ साल पुरानी हैं। कई तो पिछली पांच पीढिय़ों से यहां अपना कारोबार कर रहे हैं। यहां प्रसाद आदि का वितरण करने वाले सूरज माली का कहना है कि रात में मंदिर परिसर पर माता का फेरा रहता है, इसलिए यहां किसी को रुकने नहीं दिया जाता। सुबह चार बजे से परिसर को दर्शन के लिए खोल दिया जाता है।