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मदर्स डे विशेष : स्पेशल चाइल्ड की माताओं को है उम्मीद

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'My baby is the cutest, sweetest'

अपने बेटा-बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित हर मां के दिल में यही ख्वाईश है कि उनका ‘लाल’ कैसे भी सामान्य हो जाए। पारिवारिक, रिश्तेदारों और परिचितों की उलाहना सुनने के बाद भी अपने बच्चे के प्रति सजग ये मां उन्हें नियमित रूप से अभ्यास करवा रही हैं, ताकि उनका लाल सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।

जबलपुर.

अपने बेटा-बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित हर मां के दिल में यही ख्वाईश है कि उनका ‘लाल’ कैसे भी सामान्य हो जाए। पारिवारिक, रिश्तेदारों और परिचितों की उलाहना सुनने के बाद भी अपने बच्चे के प्रति सजग ये मां उन्हें नियमित रूप से अभ्यास करवा रही हैं, ताकि उनका लाल सामान्य जीवन व्यतीत कर सके। मातृत्व दिवस पर महिलाओं से बातचीत की गई तो उन्होंने ऐसी मां के लिए संदेश दिया है कि वे बच्चे के भविष्य को देखते हुए उसे स्वस्थ वातावरण में रखें, जिससे उसमें आशातीत परिवर्तन आएगा।

स्पेशल चाइल्ड के बारे में जानकारी उसके तीन वर्ष तक पहुंचने के साथ ही परिजनों को हो पाती है। तीन वर्षों में बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखने के बाद कुछ मां तो सजग होकर उसे पुर्नवास केन्द्रों तक ले जाती हैं लेकिन कई ऐसी भी हैं, जो जाने-अनजाने में पारिवारिक कारणों से पिछड़ रही हैं। ऐसे में बच्चे का विकास थम जाता है और उसे इलाज के साथ नियमित अभ्यास की जरूरत होती है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसमें बच्चे के ट्रीटमेंट में कमी से हालत बिगड़ी है।

मां की चाहत

● बच्चे का ट्रीटमेंट जरूर करवाएं।

● गुनियाई-भुतियाई में न पड़ें।

● बच्चे को स्वस्थ्य वातावरण देने का प्रयास करें।

● बच्चे को तिरस्कृत न होने दें।

● ऐसे बच्चों के लिए स्कूलों में अलग सिलेबस होना चाहिए।

ये कहती हैं ...

● करमचंद चौक की रहने वाली गुलअफ्सा कहती हैं उसका छह वर्ष का बेटा स्पेशल चाइल्ड है। परिवार में लोग इसे समझ नहीं सके। लिहाजा तीन माह से हम नियमित अभ्यास करवा रहे हैं, जिससे उसमें काफी परिवर्तन आया है।

● गोपाल आर्केड में रहने वाली नंदिनी अग्रवाल का कहना है कि उसका चार वर्ष का बेटे के स्पेशल चाइल्ड होने की जानकारी मिलने के बाद ट्रीटमेंट में देर नहीं की है। हमारी कोशिश यही है कि उसे जल्दी सामान्य कर सकें।

● सिंगरौली की रहने वाली गोरी पांडीक का कहना है कि उसके बेटा साढ़े तीन वर्ष का है। सिंगरौली में पुर्नवास केन्द्र नहीं होने से वह शहर में शिफ्ट हुई है और डेढ़ महीने के अभ्यास से बेटे में खासा परिवर्तन आया है।

● गंगानगर की रहने वाली रानू शर्मा का कहती हैं कि उसके साढ़े तीन साल की बेटी स्पेशल चाइल्ड की श्रेणी में हैं। पिता भूतपूर्व सैनिक हैं। बच्चे को अकेला छोड़ नहीं सकते हैं, एक माह के अभ्यास से काफी परिवर्तन आया है।

● महाराजपुर निवासी अनुपमा बाजपेई कहती हैं कि उसकी बेटी आठ साल की हो गई है। उसके हार्ट में छेद थे, उसका तो ट्रीटमेंट ले लिया है लेकिन स्पेशल चाइल्ड में उसे बोलने में परेशानी थी, अब अभ्यास के बाद वह इशारे से समझने लगी है।

● शहडोल की रहने वाली सरिता वर्मा ने साढ़े चर वर्ष के बेटे की खातिर शहर में बस गई है। बच्चे को नियमित अभ्यास करवा रही है। परिवार का उसे सहयोग मिला है, जिससे उसे 15 दिनों के भीतर खासा परिवर्तन दिखाई दिया।

● महानद्दा की रहने वाली लता पटेल का कहना है कि उसका चार वर्ष का बेटा स्पेशल चाइल्ड है। स्पेशल चाइल्ड होने से परिवारजनों ने शुरूआत में हाथ पीछे खींचे लेकिन बाद में सहयोग किया है, जिससे उसे नियमित रूप से अभ्यास करवा रहे हैं।

● गोटेगांव की रहने वाली अनु जैन कहती हैं कि उसका तीन साल का बेटा है, जो ठीक से बोल नहीं पाता था। परिजनों ने शुरूआत में लेट बोलने का कहकर मामले को टाला लेकिन डॉक्टरी परामर्श के बाद से अभ्यास दिलाना शुरू किया, जिससे उसमें बदलाव आ रहा है।

- केन्द्र में बेबस और हताश होकर मां अपने बच्चे को लेकर पहुंचती हैं लेकिन उन्हें यहां अभ्यास करवा रहे हैं, जिससे बच्चों में खासा परिवर्तन हो रहा है।

संजय तिवारी, श्री भाषा पुनर्वास केन्द्र