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नर्मदा जन्मोत्सव : त्रेता युग से चली आ रही नर्मदा की चुनरी चढाने की परंपरा, श्रीराम ने अर्पित की थी पहली चुनरी

नर्मदा जन्मोत्सव : त्रेता युग से चली आ रही नर्मदा की चुनरी चढाने की परंपरा, श्रीराम ने अर्पित की थी पहली चुनरी

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Narmada birth anniversary

Narmada birth anniversary

जबलपुर. संस्कारधानी की ख्याति कई बातों के लिए है। इनमें मां रेवा को विशेष अवसरों पर चुनरी अर्पित करने की परम्परा प्रमुख है। शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार शिवपुत्री नर्मदा को सबसे पहली चुनरी स्वयं भगवान श्रीराम ने अर्पित की थी। तब से यह परिपाटी चली आ रही है। नर्मदा जयंती और गंगा दशहरा जैसे अवसरों पर तो नर्मदा के तटों पर चुनरी अर्पित करने वालों का तांता लग जाता है। इस बार नर्मदा जयंती 28 जनवरी को है। इस बार भी मां के प्रकटोत्सव पर भक्तजन बड़ी संख्या में चुनरी अर्पित करेंगे। इसके लिए चुनरी यात्रा समितियां तैयारी में जुट गई हैं।

ज्योतिषाचार्य जनार्दन शुक्ला कहते हैं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब भगवान राम चित्रकूट पहुंचे तो उन्हें शिवपुत्री मां नर्मदा के दर्शन की इच्छा हुई। तब वे सीता और लक्ष्मण के साथ यहां आए। श्रीराम ने यहां मां नर्मदा को चुनरी अर्पित कर बालू से शिवलिंग बनाया। गुप्तेश्वर पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी मुकुंददास ने बताया कि त्रेता युग में भगवान राम की उत्तर से दक्षिण तक की यात्रा काल का वर्णन पुराणों में आता है।

लम्बी-लम्बी चुनरियां

नर्मदाभक्त बताते हैं कि जयंती व अन्य अवसरों पर माता रेवा को पंद्रह वर्ष पूर्व छोटी चुनरियां ही चढ़ाई जाती थीं। धीरे-धीरे लम्बी चुनरी चढ़ाने का चलन बढ़ा। अब जयंती पर ही माता नर्मदा को 50 लम्बी-लम्बी चुनरियां अर्पित की जाती हैं। इनकी लम्बाई 1100 फिट व उससे अधिक होती है। रांझी से हर वर्ष नर्मदा जयंती पर निकलने वाली मां नर्मदा चुनरी पदयात्रा के संयोजक व अध्यक्ष रामदास यादव ने बताया कि गत वर्ष समिति ने 2100 फीट लम्बी चुनरी मां नर्मदा को अर्पित की थी।

एक दिन में 25 लाख रुपए की चुनरियां

नर्मदा जयंती व अन्य अवसरों पर चढ़ाने के लिए शहर में चुनरी बनाने का बड़ा कारोबार है। इस कार्य में व्यापारी, टेलर व अन्य कारीगरों को मिलाकर एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। चुनरी व्यवसायी अशोक अग्रवाल बताते हैं कि हर साल नर्मदा जयंती पर शहर में लगभग 50 हजार छोटी चुनरियां बिकती हैं। इनकी कीमत 50 रुपए से 100 रुपए के बीच होती है। नर्मदा जयंती पर ही चुनरियों का 25 लाख से अधिक का कारोबार होता है।

ऑर्डर पर बनती हैं बड़ी चुनरियां

चुनरी व्यवसायियों का कहना है कि बड़ी चुनरियां केवल आर्डर पर बनाते हैं। इसके लिए कुछ लोग कपड़ा, गोटा खरीदकर देते हैं। बड़ी चुनरियों को बनाने में 4-5 दिन का समय लगता है।

देवी को भी अर्पित

नर्मदा जयंती के साथ ही शहर में देवी मां को भी चुनरी अर्पित करने की परम्परा है। दोनों नवरात्र में देवी मंदिरों में बड़ी संख्या में चुनरी अर्पित की जाती हैं। चुनरी व्यापारी बताते हैं कि देवी को नर्मदा जयंती की तुलना में साल-भर में दोगुनी चुनरी चढ़ाई जाती हैं। लम्बी-लम्बी चुनरियों की श्रंखला में आजकल साडिय़ां जोडकऱ भी चुनरी चढ़ाई जा रही हैं। नर्मदा तट स्थित नवग्रह मंदिर से गुरुद्वारा तक नाव के जरिए ले जाकर चुनरी अर्पित की जाती है। साडिय़ों से बनी चुनरी अर्पित करने के बाद भक्त इसमें लगी साडिय़ां दान कर देते हैं।