
आजादी के सात दशक बाद भी नहीं बदली खुसरा गांव की तस्वीर
बालमीक पाण्डेय@कटनी। देश को आजाद हुये 7 दशक बीत गए..., कई चुनाव आये, कई वादे हुये, लेकिन खुसरा गांव की तस्वीर और ग्रामीणों की तकदीर नहीं बदली, प्राकृतिक झरने यानी गड्ढे का पानी पीकर प्यास बुझाना यहां के वाशिंदों की मजबूरी में शामिल है। लम्बी दूरी करके यहां से पानी लाना और फिर दिन भर उसी से निस्तार का काम चलाना एक तरह से उनकी नियति बन चुका है। कटनी की बहोरीबंद विधानसभा में आने वाली नैगवां ग्राम पंचायत के खुसरा गांव ही नहीं यहां के कुछ अन्य समीपी गांवों में भी यही समस्या है। जिम्मेदारों का तर्क है कि गांव पहाड़ी पर बसा है, इसलिए पानी की व्यवस्था नहीं हो पाई, लेकिन नल-जल योजना के दावों के बीच ग्रामीणों की यह समस्या यक्ष प्रश्न से कम नहीं है। रोजगार की कमी भी आदिवासी बहुल खुसरा गांव के लोगों के दर्द के दर्द का हिस्सा है।
बमुश्किल 20 लीटर पानी
बहोरीबंद विधानसभा के अंतर्गत पहाड़ी की तराई में बसे आदिवासी बहुल खुसरा गांव ने आधुनिकता की चमक नहीं देखी। खुसरा ही नहीं ग्राम पंचायत नैगवां के रमपुरा, कोड़ाई और सूखा गांव में भी पहुंच मार्ग पगडंडी नुमा है। ग्राम पंचायत की आबादी 1600 के आसपास है। पानी की समस्या पांचों गांवों में कमोबेश एक जैसी है। बारिश का पानी तो इनकी चार माह तक प्यास बुझा देता है, लेकिन गर्मी में स्थिति पपीहा जैसी हो जाती है। एक सवाल पर गांव के जगत सिंह (56) सुकल सिंह (70), विशन सिंह आदि ने बताया कि इतने वर्षों से जब माननीय पानी की व्यवस्था नहीं कर पाये तो फिर और विकास की बात कैसी। पहाड़ी की करीब 60 मीटर गहरी खाई में उतरने के बाद चट्टान से रिसती एक-एक बूंद जब गड्ढे में एकत्रित हो जाती है, तब हम लोगा लोटे या जग से पानी निकालकर उसे डिब्बों या बाल्टी में भरते हैं। इसी पानी से प्यास बुझाते हैं और निस्तार करते हैं। गर्मी में बमुश्किल लोगों एक 15 सेे 20 लीटर पानी मिल पाता है। गांव में सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है तो फिर खेती कर ही नहीं पाते।
वनोपज ही जिंगदी का सहारा...
पेट पालने के लिए जंगल में कड़ी धूप में आंवला तोड़ रहे नैगवां निवासी अमेर सिंह कि आंखों में उस समय आंसू आ गये जब पत्रिका टीम ने पूछा कि आप इन आंवलों का क्यों करेंगे? अमरे ने कहा कि कुछ मत पूछो भैया, यदि जंगल नहीं होता तो हम लोग कबके मौत के मुंह में समा गये होते। पांच गांव के लोग गर्मी के सीजन में महुआ, आंवाल, चार, तेंदूपत्ता, हर्रा, बहेरा सहित अन्य जड़ी-बूटियां बीनते हैं और इन्हीं के सहारे गुजर-बसर चल रही है। जब पत्रिका इन गांवों में पड़ताल के लिए पहुंची तो बीच जंगल नैगवां के सदर सिंह और शिवचरण सिंह ने भी यही दर्द बयां किया। उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्र की वजह से यहां खेती नहीं होती है।
बेटी ब्याहने तैयार नहीं होते लोग
खुसरा निवासी सुकल सिंह (70) ने गांव की समस्याओं में एक और ज्वलंत समस्या बताई। उन्होंने कहा कि गांव के लिए पककी सडक़ नहीं होने और मुख्य मार्ग से गांवों की दूरी 7 से 10 किलोमीटर हैं। आवागमन का कोई साधन नहीं हैं। ऐसे में इन गावों में लोग बेटियों को बड़ी मुश्किल से ब्याहते हैं। गांव के लोग इतने संपन्न नहीं हैं कि आवागमन के लिए वे खुद के साधन आदि जुटा सकें।
केवल एक बार आए विधायक
गांव के सुखराम सिंह, मरन सिंह, रमान सिंह ने बताया कि मनरेगा में उन्हें किसी तरह 100 दिन का रोजगार तो मिल जाता है, लेकिन मजदूरी के लिए कई माह सचिव, सरपंच और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ते हैं। शेष बचे 265 दिन उनका घर कैसे चले इस पर किसी का ध्यान नहीं है। गांव से कस्बा दूर होने, आवागमन का साधन न होने के कारण ग्रामीण देहाड़ी-मजदूरी भी नहीं कर पाते। ऐसे में पलायन भी उनकी मजबूरी बनता जा रहा है। विशन सिंह ने कहा कि आजादी के 72 साल बाद यदि हमें गड्ढे का पानी पीना पड़े तो फिर अब तो नेताओं को देखना भी पसंद नहीं करेंगे। क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक सौरभ सिंह द्वारा गांव में विकास के नाम पर सिर्फ एक छोटा से रंगमंच बनवाया गया है। वे केवल एक बार गांव आए हैं।
गांव का नाम ही पड़ा सूखा
खास बात यह है कि इन गांवों की ऐसी स्थिति ऐसी है कि बारिश होने पर किसान खेती को कर लेते हैं, लेकिन बारिश कम होने पर फसल सूख जाती है। सुकल सिंह ने बताया कि गांव में इस बार धान अच्छी होने की उम्मीद थी, लेकिन बारिश बंद होने के बाद एक भी पानी न गिरने से फसल सूख गई है। लगातार सूखा होने के कारण पंचायत के एक गांव का नाम ही सूखा पड़ गया है। ग्रामीणों की मानें तो पांच साल में माननीय ने एक पानी का टैंकर दिया है जो सिर्फ ग्राम पंचायत की शोभा बढ़ा रहा है।
केवल वादे ही सुने
पत्रिका से चर्चा के दौरान जगत सिंह, गजराज सिंह, कुंजल सिंह, राम सिंह आदि ने बेबाकी से अपनी बात रखते हुये कहा कि चुनाव आने पर विधायक, सांसद सहित अन्य नेता वादे करके जाते हैं, आश्वासन देते हैं, लेकिन जीतने के बाद मुंह फेर लेते हैं। वर्षों से परेशानियों का दंश झेल रहे हैं, अब तो हमारी आत्मा रो रही है। गांव में पानी की व्यवस्था कराने, डैम बनवाने, सडक़ निर्माण की कई वर्षों से मांग की जा रही है, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि ने तवज्जो नहीं दी। अब किसे और क्यों वोट डालें यही समझ में नहीं आ रहा है।
Published on:
27 Oct 2018 07:31 pm

बड़ी खबरें
View Allजबलपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
