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सिविल जज परीक्षा में छह पेशियों की अनिवार्यता पर राहत

हाईकोर्ट में सुनवाई  

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Court News: नशे के लिए रुपए नहीं देने पर पिता की हत्या के अपराधी को कारावास की सजा

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जबलपुर। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ व न्यायाधीश विशाल मिश्रा की युगलपीठ ने सिविल जज पात्रता परीक्षा में याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने सिविल जज परीक्षा के लिए तीन वर्ष की वकालत के अनुभव की पात्रता में शामिल प्रतिवर्ष छह पेशियों की अनिवार्यता को शिथिल करते हुए याचिकाकर्ताओं को अनुमति देने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने इस मामले में रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी कर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने छह पेशियों को छोड़कर शेष पात्रता में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

याचिकाकर्ता इंदौर निवासी नेहा कोठारी व अन्य अधिवक्ताओं ने सिविल जज की प्रवेश परीक्षा में लगी उस शर्त को चुनौती दी थी, जिसमें पिछले तीन वर्ष में प्रति वर्ष कोर्ट में छह पेशियों या ऑर्डर कॉपी का सबूत देने की बाध्यता थी। सिविल जज परीक्षा 14 जनवरी 2024 को आयोजित होगी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता एवं कपिल दुग्गल ने तर्क दिया कि सिविल जज परीक्षा के शामिल होने के लिए वैकल्पिक पात्रता के तहत विधि स्नातक की सभी परीक्षाओं में कुल मिलाकर न्यूनतम 70 प्रतिशत अंक रखे गए हैं।

दलील दी गई कि तीन वर्ष की अनिवार्यता सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन के निर्णय के मानदंडों के विपरीत है। यह भी कहा गया कि विधि स्नातक डिग्री में 70 प्रतिशत अंकों की पात्रता, वह भी प्रथम प्रयास में एक ऐसी शर्त है, जो असंवैधानिक है। अलग-अलग विश्वविद्यालयों, शासकीय एवं निजी लॉ कॉलेजों की अलग-अलग परीक्षाएं होती हैं, जिनमें अलग-अलग गणनाओं से अंक दिए जाते हैं। सभी को एक समान नहीं माना जा सकता।