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जबलपुर। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि महाधिवक्ता कार्यालय के सरकारी वकीलों की नियुक्ति में आरक्षण के प्रावधानों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है? जस्टिस विशाल धगट की सिंगल बेंच ने चार सप्ताह में जवाब मांगा। ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव रामभजन सिंह लोधी की ओर से याचिका दायर कर राज्य सरकार के उस आदेश की वैधानिकता को चुनौती दी गई, जिसमें सरकार ने कहा था कि सरकारी वकील का पद लोकपद की परिभाषा में नहीं आता। इसलिए इसमें आरक्षण नियमों को लागू किया जाना संभव नहीं है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से चार सप्ताह में मांगा जबाब
सरकारी वकीलों की नियुक्तियों में क्यों नहीं किया जा रहा आरक्षण के प्रावधानों का पालन
अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व विनायक प्रसाद शाह ने तर्क दिया कि आरक्षण अधिनियम की धारा 2 में स्पष्ट रूप से लोक सेवक एवं लोक पदों को परिभाषित किया गया है जिसके अंतर्गत शासकीय अधिवक्ताओं का पद लोक सेवक एवं लोक पद माना गया है। एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने पूर्व में भी याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 4 सितम्बर 2020 को आदेश पारित कर सरकारी वकीलों की नियुक्तियों में आरक्षण देने पर विचार करने का सरकार को निर्देश दिया था। लेकिन प्रदेश सरकार ने 7 नबम्बर 2020 को आदेश जारी कर सरकारी वकीलों की नियुक्तियों में आरक्षण से साफ इंकार कर दिया। यह भी तर्क दिया गया कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में विगत 30 वर्षों से अधिकतर सरकारी वकीलों को ही हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्ति की जाती है। उच्च न्यायालय में अभी तक किसी भी एससी, एसटी व ओबीसी को एडवोकेट कोटे से हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्ति नहीं मिली।
Published on:
20 Mar 2021 12:45 pm

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