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550 साल पुरानी है सदर की एसी वाली काली माई, गर्मी में निकलता है पसीना

जबलपुर के सदर में स्थित प्राचीन काली माई मंदिर आकर्षण और जनआस्था का बड़ा केन्द्र है। चैत्र नवरात्र पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजन वंदन के लिए पहुंच रहे हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थापित काली माता की प्राचीन प्रतिमा पर गर्मी में अपने आप पसीना निकलने लगता है। माता को पसीना नहीं निकले इसलिए भक्तों ने मंदिर में बकायदा एसी लगवा दिए हैं, जो हमेशा चालू रहते हैं। इसलिए क्षेत्रीयजन इन्हें एसी वाली काली माई कहते हैं।

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सदर में स्थित प्राचीन काली माई मंदिर

,सदर में स्थित प्राचीन काली माई मंदिर

चैत्र नवरात्र पर दर्शन-पूजन के लिए उमड़ रही भीड़

जबलपुर।

जबलपुर के सदर में स्थित प्राचीन काली माई मंदिर आकर्षण और जनआस्था का बड़ा केन्द्र है। चैत्र नवरात्र पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजन वंदन के लिए पहुंच रहे हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थापित काली माता की प्राचीन प्रतिमा पर गर्मी में अपने आप पसीना निकलने लगता है। माता को पसीना नहीं निकले इसलिए भक्तों ने मंदिर में बकायदा एसी लगवा दिए हैं, जो हमेशा चालू रहते हैं। इसलिए क्षेत्रीयजन इन्हें एसी वाली काली माई कहते हैं।

गोंडवाना काल की प्रतिमा-

मंदिर ट्रस्ट के पंडित शिवचरण दीक्षित के अनुसार लगभग 550 साल पुरानी काली माता की भव्य प्रतिमा गोंडवाना साम्राज्य के दौरान स्थापित की गई थी। उन्होंने बताया कि मंदिर में श्रंगार के वक्त जब एसी बंद होते हैं तो मां की प्रतिमा पर अपने आप पसीने जैसी बूंदे उभर आती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मां काली की प्रतिमा विशेष प्रकार के पत्थर से बनी हुई है। इसमें पसीने जैसी पानी की बूंदें कहां से आ जाती है, यह रहस्य समझ में नहीं आया। हो सकता है कि पत्थर की कोई अपनी खासियत हो, लेकिन भक्तों ने इसे माता का चमत्कार मान लिया है। यही कारण है कि मंदिर के हाल में एसी लगवा दिए गए हैं। ताकि गर्मी में माता को पसीना नहीं आए।आर्कियोलॉजी के जानकार बताते हैं कि गर्मी में प्रतिमा पर पसीने जैसी बूंदों का आना हैरान करने वाला है। प्रतिमा पर तैलीय पदार्थों आदि की भी जांच की गई, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। जानकार इसे आस्था से जुड़ा विषय बताते हैं।


हिली तक नही मूर्ति-


स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि रानी दुर्गावती के शासनकाल में मां शारदा और काली की मूर्ति को बैलगाड़ी पर मंडला से जबलपुर लाया गया था। इन दोनों प्रतिमाओं को मदनमहल पहाड़ी पर स्थापित किया जाना था। राता होने की वजह से बैलगाड़ी चालक ने दोनों प्रतिमाओं को सदर बाजार (वर्तमान स्थल) पर बैलगाड़ी उतार दिया। वह रात्रि विश्राम के लिए घर चला गया। सुबह आकर उसने दोनों प्रतिमाओं को फिर से बैलगाड़ी पर रखने का प्रयास किया। इस दौरान मां शारदा देवी की प्रतिमा तो उठ गई, लेकिन काली माता की मूर्ति उस स्थान से टस से मस नहीं हुई। लोगों ने खूब प्रयास किए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बाद में क्षेत्रीय जनों ने प्रतिमा को यहीं पर स्थापित कराने का निर्णय लिया। उस समय से प्रतिमा यहीं विराजमान है। पहले प्रतिमा पीपल के वृक्ष के नीचे थी। अब वहां भव्य मंदिर बन गया है। चैत्र नवरात्र पर यहां विशेष अनुष्ठान होते हैं।

दूसरी प्रतिमा मदनमहल में-

स्थानीय मान्यतानुसार मदन महल किले के समीप पहाड़ी पर विराजित मां शारदा देवी की प्रतिमा उसी समय की है। बताया जाता है कि काली माता की प्रतिमा को सदर में ही छोडकऱ इस प्रतिमा को मदनमहल की पहाड़ी पर लाया गया। यहां इनकी विधि विधान से स्थापना करायी गई। मदन महल स्थित शारदा देवी मंदिर में भी भक्तों का मेला लगता है। सावन में तो यहां देवी मां को इतने ध्वज चढ़ाए जाते हैं कि पूरी पहाड़ी लाल दिखने लगती है।


मनोकामना होती है पूरी-

सदर की मां काली की एसी वाली गाथा जो भी सुनता या पढ़ता है, वो उनके दरबार में जरूर दर्शन करने आता है। नवरात्र के समय मां काली के दर्शन लाभ लेने के लिए जबलपुर सहित कई जिलों के भक्त यहां आकर अपनी मनोकामना पूर्ण होने की उनसे अर्जी लगाते है। यही वजह है कि नवरात्र में माता के मंदिर में तडक़े सुबह से ही भक्तों की भीड़ का सिलसिला आरम्भ हो गया है, जो देर रात तक चल रहा है।

रात में कोई नहीं रुकता-

मंदिर प्रबंधन के अनुसार यहां माता की मौजूदगी पूरे समय बनी रहती है, इसलिए रात को मंदिर परिसर पूरी तरह से खाली करवा दिया जाता है। रात को कोई भी मंदिर में नहीं रुकता है। मंदिर के सामने स्थित प्रसाद व पूजन सामग्री की दुकानें भी करीब दो सौ साल पुरानी हैं। कई तो पिछली पांच पीढिय़ों से यहां अपना कारोबार कर रहे हैं। यहां प्रसाद आदि का वितरण करने वाले सूरज माली का कहना है कि रात में मंदिर परिसर पर माता का फेरा रहता है, इसलिए यहां किसी को रुकने नहीं दिया जाता।