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doctor advice : 14 साल से कम उम्र के बच्चों को न दें पर्सनल मोबाइल फोन, इस गंभीर बीमारी के हो रहे है शिकार

मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक बोले, मानसिक बीमारियां बढ़ा रहा सेल्फी का जुनून
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जबलपुर

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Deepankar Roy

•

Updated: 9 Nov 2017, 12:17 PM IST

hindi news

Selfies passion for mobile phones mental patient made of children

जबलपुर। एक जमाना था, जब बच्चे खेल के मैदान में पसीना बहाते थे। शरीर सुडौल बनाने की ललक थी। अब गलत ट्रेंड बन गया है। आज के बच्चे अच्छी सेल्फी के लिए सब कुछ कर रहे हैं, एप के जरिए अपनी फोटो मॉडिफाई कर फेसबुक पर पोस्ट कर रहे हैं। इससे वर्तमान में उनकी शिक्षा और बाद में कॅरियर पर असर पड़ रहा है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक उनका मोबाइल फोन से सेल्फी लेने का जूनून है। यह जुनून की हद तक पहुंच गया है। इससे मानसिक स्थिरता प्रभावित होती है, साथ ही एक समय ऐसा आता है, जब यह जानलेवा भी बन जाता है। इन गंभीर परिणामों से बच्चों की सेहत प्रभावित होने के चलते मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक की सलाह है कि १४ साल से कम उम्र के बच्चों को पर्सनल फोन नहीं देना चाहिए।
सर्वे में चौंकाने वाली हकीकत
नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के मानिसिक रोग विभाग में हुई डिजिटल मीडिया एंड मेंटल हेल्प में आए लोक मान्य तिलक म्युनिसिपल मेडिकल कॉलेज मुम्बई के डॉ. अविनाश डिसूजा ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि १५ बच्चों के सर्वे में चौकाने वाली हकीकत सामने आई। ८, ९वीं क्लास के ९० फीसदी बच्चों के हाथ स्मार्ट फोन हैं। १२-१५ सेल्फी ले रहे हैं। गोरा, पतला हो या हेयर स्टाइल बदलना, सब एप से कर रहे हैं। उन्हें बताना चाहिए कि शरीर प्राकृतिक तौर पर अच्छा बनाएं।
ब्लू ह्वेल में फंस रहे बच्चे
मनोनचिकित्सकों ने कहा कि मां-बाप की जिम्मेदारी है बच्चों को किस्से-कहानियों आदि से सच बोलना सिखाएं। जिन बच्चों को दु:ख बांटने का कोई माध्यम नहीं है, वे ही ब्लू ह्वेल गेम फंस रहे हैं। क्लास रूम काउंसलिंग करनी होगी। युवक-युवतियों में गुस्सा होना परिस्थिति या आनुवांशिक हो सकता है। जबकि काउंसलिंग से टूटते रिश्ते बचा सकते हैं।
सेल्फी लेने के दौरान सबसे ज्यादा मौतें भारत में
मनोचिकित्सकों का कहना है कि मोबाइल फोन का उपयोग सेल्फी लेने के लिए एक हद तक तो उचित कहा जा सकता है, लेकिन युवाओं में यह जुनून की हद तक पहुंच गया है। इससे मानसिक स्थिरता प्रभावित होती है, कई मामलों में यह जानलेवा साबित हो रहा है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा है कि सेल्फी लेने के दौरान दुर्घटना में होने वाली सबसे ज्यादा मौतें भारत में हो रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स का उपयोग और उन पर बढ़ती निर्भरता मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रहे हैं। बच्चों और युवाओं की मानसिक अवस्था पर इनके दुष्प्रभाव की लगातार रिपोर्ट आ रही है।
सेमीनार में कई जानकारियां
नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में आयोजित सेमीनार में देश भर से आए मनोचिकित्सकों ने म्यूनिकेशन गैप के कारण समाज में आ रहे बदलाव, मानसिक स्थिति और बदलती सोच पर विस्तार से जानकारी दी। डिजिटल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य पर भी चिकित्सकों ने विचार रखें। इस अवसर पर डीन डॉ. नवनीत सक्सेना, अधीक्षक डॉ. राजेश तिवारी, मानसिक रोग विभाग के एचओडी डॉ. पीके जुयाल, डॉ. ओपी राय चंदानी, डॉ. वायआर यादव, डॉ. कविता सचदेवा, डॉ. पवन घनघोरिया एवं डॉ. बीके गुहा, डॉ रत्नेश कुरारिया मौजूद थे।