30 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

importance of Chaturmas : चातुर्मास में पडऩे वाली शिव चतुर्दशी का महत्व और पूजा विधि

चातुर्मास में पडऩे वाली शिव चतुर्दशी का महत्व और पूजा विधि  

2 min read
Google source verification
shiva

shiva

चातुर्मास में पडऩे वाली शिव चतुर्दशी का महत्व और पूजा विधि
जबलपुर. चतुर्मास को चौमासा और वर्षा काल भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी से लेकर श्रावण, भाद्रपद, अश्विन एवं कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तक के चार माह के समय को चातुर्मास कहा जाता है। इन्हीं चार महीनों की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को चौमासी शिव चौदस के नाम से जाना जाता है। साल में हर शुक्ल पक्ष की चौदस को शिव चौदस कहा जाता है। वैसे तो हर माह की शुक्ल पक्ष की चौदस को भगवान शिव की पूजा करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है, लेकिन चातुर्मास में पडऩे वाली

भारत में भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार मौसम में विविधता पाई जाती है। छह ऋतुओं में से एक वर्षा ऋतु है। वर्षा ऋतु के काल की अवधि चार माह की होती है इसलिए इसे चौमासा कहा जाता है। पं विपिन शास्त्री कहते हैं कि वर्षा ऋतु का आगमन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मानसून की पहली बारिश से ही माना जाता है। आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी या देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी या देवउठनी एकादशी तक रहता है। चौमासे के इन चार महीनों को बहुत खास माना जाता है, जिस कारण इन महीनों में पडऩे वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी या चौमासी चौदस को भगवान शिव जल्द प्रशन्न हो जाते हैं।

पौराणिक मान्यता
प्राचीन काल से यह मान्यता चली आ रही है कि भगवान शिव को चौमासी चौदस बहुत प्रिय होती है। इन महीनों में भगवान विष्णु निद्रा में लीन रहते हैं। इस कारण भगवान शिव की आराधना करने की मान्यता है। भगवान शिव व शक्ति के मिलन के पर्व के रूप में भी इस चतुर्दशी की बहुत अधिक मान्यता है। पौराणिक मान्यता तो यह भी है कि ज्योतिर्लिंगों का प्रादुर्भाव चतुर्दशी के प्रदोष काल में ही हुआ था। पुराणों में भी इसके प्रमाण मिलते हैं कि दिव्य ज्योतिर्लिंग का उद्भव इसी तिथि को हुआ था। यही कारण है प्रत्येक मास की दोनों चतुर्दशी शिव चतुर्दशी भी कहा जाता है।

चौदस पूजा की विधि
चतुर्दशी पर भगवान भोलेनाथ का पूजन करने के लिए तन और मन से उपासक का निर्मल होना नितांत आवश्यक है। मन, वचन व कर्म से व्यक्ति का स्वच्छ होना ही वास्तविक रूप से निर्मल होना है। उपासना के लिए घर की पूर्व दिशा में पीले रंग का कपड़ा बिछाकर विधि-विधान से पारद शिवलिंग, शिवयंत्र या फिर पार्थिव शिवलिंग की स्थापना कर पूजन करना चाहिए। घी का दीपक, धूप, तिलक के लिए पीला चंदन, पीले रंग के फूल, भोग लगाने के लिए खीर एवं पीले फल पूजा में उपयोग कर सकते हैं। रुद्राक्ष की माला लेकर 108 बार भगवान शिव के विशेष मंत्र का जाप करने से भगवान शिव जल्द प्रशन्न होते हैं।

इन मंत्रों का करें जाप
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्
त्रिजन्म पापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।
ऊँ नम: शिवाय, ऊँ नीलकण्ठाय नम:, ऊँ रूद्राय नम:, शिवाय नम:, ऊँ पार्वतीपतये नम:, ऊँ पशुपतये नम: आदि मंत्रों का पूजन के समय जाप करने से भगवान शिव प्रशन्न होते हैं।

चातुर्मास में धार्मिक अनुष्ठान व दान पुण्य का महत्व
चतुर्मास में धर्म-कर्म व दान का भी बहुत महत्व माना गया है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु शयनमुद्रा में चले जाते हैं और वह देवउठनी एकादशी को जागृत होते हैं। ऐसे में साधु-संतों ने इन चार महीनों में धार्मिक कार्यों में लगे रहने का विधान बताया है।

Story Loader