Shradh 2017 यहां से शुरू हुई थी पिंडदान की परंपरा, देवताओं ने इस घाट पर किया था पितरों का तर्पण

Shradh 2017 यहां से शुरू हुई थी पिंडदान की परंपरा, देवताओं ने इस घाट पर किया था पितरों का तर्पण
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Lalit Kumar Kosta | Updated: 31 Aug 2017, 03:46:00 PM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

गयाजी कुण्ड के पास देवराज इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी के पद चिह्न आज भी मौजूद हैं

जबलपुर। संस्कारधानी के समीप एक ऐसा स्थान है जहां देवताओं के राजा इंद्र ने स्वयं अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान किया था। मान्यता है कि लम्हेटाघाट के समीप स्थित इंद्र गया से ही पिंडदान की शुरुआत हुई थी। आज भी यहां हजारों श्रद्धालु पिंड दान करने के लिए पहुंचते हैं। नर्मदा किनारे स्थित इंद्र गया में प्रकृति ने भी इतना सौंदर्य उड़ेला है कि लोग उसके आकर्षण में बंधे रह जाते हैं।

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मनु ने भी किया था श्राद्ध
नर्मदा चिंतक पं. सतीश शुक्ल ने बताया कि शास्त्रों में वर्णित है कि देवराज इंद्र ने अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करने एवं मोक्ष के लिए नर्मदा के लम्हेटाघाट स्थित गयाजी कुण्ड में किया था। जिसका प्रमाण गयाजी कुण्ड के पास देवराज इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी के पद चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं। पुराणों के अनुसार पृथ्वी के प्रथम राजा मनु ने भी यहां पर अपने पितरों का श्राद्ध किया था । पौराणिक महत्ता के अनुसार नर्मदा को श्राद्ध की जानन कहा जाता है।

कहलाता है त्रिशूलभेद नागक्षेत्र
पुराणों के अनुसार तिलवाराघाट उत्तर दक्षिण तट त्रिशूलभेद नागक्षेत्र भी कहलाता है। त्रिशूलभेद की महत्ता का उल्लेख नर्मदा पुराण में किया गया है। जिसमें बताया गया है कि नर्मदा परिक्षेत्र में किया गया श्राद्ध गया गंगा के गया तीर्थ से भी सर्वोपरि है।

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ये भी मान्यता -
धार्मिक मान्यताओं से समृद्ध शहर एक ऐसा भी स्थान है जहां साक्षात मां नर्मदा का ही वास नही है, बल्कि इस तट पर देवों का भी आगमन हुआ है। पितृपक्ष में अब भी यहां बड़ी संख्या में लोग पिंडदान के लिए पहुंचते हैं। आज हम आपको इसी स्थान के बारे में बता रहे हैं...

-मान्यता है कि जबलपुर के लम्हेटाघाट के समीप स्थित इंद्रगया से ही पिंडदान की शुरुआत हुई थी। शास्त्रों में उल्लेख है कि देवराज इंद्र ने अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करने एवं मोक्ष के लिए नर्मदा के लम्हेटाघाट स्थित गयाजी कुण्ड में पिंडदान किया था।

-गयाजी कुण्ड के पास देवराज इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी के पद चिह्न आज भी मौजूद हैं।

-पुराणों के अनुसार पृथ्वी के प्रथम राजा मनु ने भी यहां पर अपने पितरों का श्राद्ध किया था।

-नर्मदा पुराण के अनुसार नर्मदा परिक्षेत्र में किया गया श्राद्ध-तर्पण, गंगा के गया तीर्थ से भी अधिक पुण्यकारी है।

-लम्हेटाघाट में कुम्भेश्वर तीर्थ भी मौजूद है। इसके बारे में कथा प्रचलित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, लक्ष्मण व हनुमान ने ब्रम्ह हत्या व शिव दोष से मुक्ति के लिए 24 वर्ष तक तपस्या व उपासना की थी।

-इसके प्रमाण स्वरूप यहां कुम्भेश्वर तीर्थ मंदिर है, जिसमें एक जिलहरी पर दो शिवलिंग स्थापित हैं।

-जिस प्रकार गंगा में स्नान का पुण्य है उसी प्रकार नर्मदा के दर्शन मात्र का पुण्य है। पुराणों के अनुसार नर्मदा के धरती पर अवतरण के बाद ही पिंडदान की प्रथा शुरू हुई और भटकती आत्माओं को शांति मिली।

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