
non-clinical PG seats
मनीष गर्ग@जबलपुर। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में नॉन क्लीनिकल कोर्स में प्रवेश का ग्राफ बीते कुछ वर्षों से कम हो रहा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में बीते तीन वर्ष के आंकड़ें देखे तो यहां पोस्ट ग्रेज्युएट डिग्री कोर्स में नॉन क्लीनिकल पीजी सीटों में प्रवेश कम हो रहे हैं। इन सीटों के खाली रहने के पीछे विशेषज्ञ कुछ विसंगति व राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग की नीतियों को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
कुछ प्रमुख विभाग तो ऐसे हैं जिनमें आने वाले समय में टीचर ही नहीं मिलेंगे। नॉन क्लीनिकल सीटें प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ही ज्यादा हैं। अब युवा डॉक्टर एमबीबीएस के बाद क्लीनिकल कोर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके पीछे कारण यह है कि उनके पास टीचिंग और प्रेक्टिस दोनों विकल्प रहते हैं। वहीं नॉन क्लीनिकल टीचर्स के 20 प्रतिशत पद ऐसे होते हैं जिसके लिए एमबीबीएस करना अनिवार्य नहीं रहता है वहां एमएससी के आधार पर नौकरी मिल जाती है।
नॉन क्लीनिकल कोर्स करने के बाद विशेषज्ञ को टीचिंग के क्षेत्र में ही ज्यादा जाने का अवसर मिलता है। टीचिंग व नौकरी का अब युवा डॉक्टर्स में क्रेज नहीं है। मेडिकल शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। वे प्रेक्टिस को प्राथमिकता दे रहे हैं। टीचिंग के क्षेत्र में बीते कुछ वर्षों में वर्कलोड बढ़ा है। एमबीबीएस के साथ ही अब पीजी, पैरामेडिकल, डेंटल सहित अन्य कक्षाओं को भी पढ़ाना पड़ता है। कोर्स बढ़े हैं परंतु पद नहीं बढ़े। नॉन क्लीनिकल डॉक्टर्स को सरकार द्वारा कोई विशेष सुविधाएं नहीं दी जाती है। उनके लिए भी वहीं सुविधा है जो क्लीनिकल के लिए है। निजी मेडिकल कॉलेजों में शोषण है। सरकार को चाहिए कि नॉन क्लीनिकल कोर्स को प्रोत्साहित करे। यदि ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में नॉन क्लीनिकल कोर्स के लिए टीचर्स नहीं मिलेंगे। ऐसे में चिकित्सा शिक्षा छात्राों को पूर्ण ज्ञान नहीं रह जाएगा।
- डॉ. मनोहर भंडारी, सेवानिवृत्त, सह प्राध्यापक, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
Published on:
04 Jun 2022 02:16 pm
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