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mysterious holi: इस गांव में मनाई जाती है मातम की होली, हैरान कर देगी परम्परा

गांव के बाहर मेढ़े में जाकर की जाती है अजीब पूजा, महिलाएं भी निभाती हैं यह अनूठी रस्म

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mysterious holi

mysterious holi in katni, jabalpur

जबलपुर। होलिका दहन १ मार्च को है। दूसरे दिन धुरेड़ी पर सुबह से ही हर तरफ रंग बरसने लगेगा। गली, मोहल्लों में हुरियारों की टोलियां सक्रिय हो जाएंगी। अबीर-गुलाल लगाकर चेहरों पर मुस्कान बिखेरने का क्रम अनवरत चलेगा, लेकिन कटनी जिले के लखाखेरा गांव में इस बार भी सुबह से घरों में मातम जैसा माहौल रहेगा। दरअसल यह इस गांव की सदियों पुरानी परम्परा का हिस्सा है। यहां होली से पहले मातम मनाया जाता है। इसके तहत वैसी ही रस्में निभायी जाती हैं, जैसे किसी व्यक्ति की मौत के बाद मनायी जाती है। आइए होली पर आपको भी इस गांव की अनूठी परम्परा से अवगत कराते हैं...

रात से ही सूतक
कटनी जिले से 26 किलोमीटर दूर शहडोल मार्ग पर बड़वारा विकासखंड से मात्र 2 किमी की दूरी पर स्थित है ग्राम लखाखेरा...। इस गांव में वैसे तो हर त्यौहार बड़े ही सादगी और उल्लास भरे माहौल में मनाए जाते हैं। होली की यह रस्म भी गांव वालों के लिए खुशहाली से जुड़ी हुई है, लेकिन इसका तरीका और परम्परा जरा हटकर है..। गांव के ऋषिराम पाण्डेय, अजय राय ने बताया कि होली के दिन जैसे ही रात में गांव के बाहर होलिका दहन होता है वैसे ही पूरे गांव में सूतक चालू हो जाती है और धुरेड़ी के दिन शुद्धताई होती है।

ऐसे होती है सफाई
लखाखेरा निवासी राजकुमार राय, अधारीलाल महोबिया के अनुसार होलिका के जलते ही पूरे गांव में वैसा ही सूतक लग जाता है, जैसा किसी व्यक्ति की मौत पर लगता है। फर्क इतना है कि किसी व्यक्ति की मौत पर केवल उसके परिवार में सूतक लगता है, और यहां होली पर पूरे गांव में...। होलिका दहन के बाद धुरेड़ी की सुबह महिलाएं घर की साफ-सफाई करके लिपाई-पुताई करती हैं। प्रत्येक घर से एक झाड़ू और छोटा घड़ा निकाला जाता है। इस झाड़ू और घड़े को लेकर हर घर के पुरुष गांव के बाहर मेड़े (गांव के बाहर स्थित देव स्थान) में पहुंचते हैं और फिर साथ में मौजूद गांव के पंडा के द्वारा निकाई (किसी चीज को बाहर फेंकने) की रस्म पूरी कराई जाती है। इसके रस्म को पूरी करने के बाद ग्रामीण एक साथ तालाब में पहुंचते हैं। यहां स्नान और पूजन के बाद ही सभी ने घर के लिए प्रस्थान करते हैं। घर पर पूजन के बाद होली खेलने का क्रम शुरू होता है। रंग-गुलाल लगाकर एक दूसरे को शुभकामनाएं दी जाती हैं।

स्नान के बाद ही घर
गांव के बुजुर्ग गिरिजादत्त पांडेय और कमल तिवारी ने बताया कि यह एक तरह से होलिका की मौत का सूतक माना जा सकता है। चूंकि होलिका जल गई इसलिए इसलिए सूतक माना गया। यह परम्परा सदियों पुरानी है, जिसे गांव में आज भी निभाया जा रहा है। मेड़े पर पूजा होने के बाद लोग यहां से सीधे नदी या तालाब स्नान करने के लिए पहुंचते हैं। यहां बाल आदि कटवाने और नहाने के बाद ही वापस घर जाते हैं।

फिर जाती हैं महिलाएं
रामेश्वर राय ने बताया कि जब गांव के पुरुष मेड़ा में पूजा व स्नान करके लौटते हैं, तो फिर महिलाओं का नंबर आता है। वे पुताई में बची रद्दी सामान लेकर नदी के लिए रवाना होती हैं। जब वे नदी-तालाब से नहाकर लौट आती है इसके बाद ही घर में खाने-पीने और रंग-गुलाल लगाने का क्रम शुरू होता है। महिलाएं भी गीत गाकर होली का पर्व मनाती हैं।

नेकी के लिए है मान्यता
सुंदरलाल पाण्डे, राजाराम तिवारी, धनीराम यादव, सुरेश राय के अनुसार ऐसा माना जाता है कि सूतक में घर की झाडृ़ या अनुपयोगी सामाग्री बाहर कर देने से खुशियां आती हैं। नकारात्मक चीजें दूर हो जाती हैं। शुद्धिकरण व पूजन के बाद गांव के बाहर जली होली की राख उड़ाई जाती है और फिर बच्चे होली खेलना शुरु करते हैं। गांव में फागों का भी शानदार आयोजन होता है, जो अनवरत कई दिन तक चलता है। रस्म निभाए जाने के बाद यह गांव में रंग में भीग गया है। फागुनी गीतों की तान भी यहां छिड़ गई है।

छिपा है सेहत का विज्ञान
भारतीय पर्वों की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर बरगवां निवासी पं. स्व. हरि प्रसाद तिवारी ने सारगर्भित बातें लिखी हैं। उन्होंने लिखा है कि पहले मकान कच्चे होते थे। बारिश के बाद खेतों में फसल लग जाती थी। मौसम के संधिकाल में कीट पतंगे बढ़ जाते थे। सादगीपूर्ण जीवन और कच्चे मकानों आज के जैसे सुविधाएं नहीं थीं। लोग दीपावली की तरह ही होली पर भी घरों की सफाई करते थे। होली पर घर की सफाई से निकले कचरे और घरों के समीप बाडिय़ों में लगी पुरानी लकडिय़ां होलिका में जला दिया जाता था। इसके बाद घरों पर नई बाड़ लगाई जाती थी। लकडिय़ों के साथ अंडी (एक तरह का विषैला पौधा) भी जलाई जाती थी, जिससे वायरस व कीट पतंगे नष्ट जाते थे। जलती होली में ही चना व नवधान्य का होला भूंजा जाता था, जिसे लोग खाते थे।

तीन बार ही होती है सूतक
ज्योतिषाचार्य पं. अखिलेश त्रिपाठी के अनुसार वैदिक सनातन धर्म में तीन प्रकार से सूतक का उल्लेख है। एक सूतक तब मनाते है जब घर परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है। यह सूतक दस दिन तक यानी दशगात्र तक चलता है। घर की साफ-सफाई, घर की शुद्धता पर दशगात्र के बाद ही सूतक खत्म होता है। इसके बाद दिवंगत आत्मा की शांति के लिए पाठ, पूजन, त्रयोदशी आदि होती है। दूसरा सूतक चंद्र व सूर्य ग्रहण के समय मनाया जाता है, जो केवल ग्रहणकाल की अवधि तक माना जाता है। तीसरा सूतक घर में प्रसव यानी शिशु के जन्म का होता है। इसके सोवर भी कहते हैं, जो सामान्यतया 12 दिन तक चलता है। होली में भी सूतक की परम्परा है, लेकिन अब यह लुप्त हो चली है।