विवेकानंद साहित्य का संकलन करने और पढऩे में रुचि रखनेवाले शिक्षाविद संजय नेमा बताते हैं कि स्वामीजी के भाषणों में न केवल उनका ज्ञान उभरकर सामने आता है बल्कि उनकी पारलौकिक शक्तियों से भी साक्षात्कार हो जाता है। स्वामी विवेकानंद यह बात भली-भांति जानते थे कि उनकी आयु बहुत कम है। अपनी मृत्यु का उन्हें पूर्वाभास था और उन्होंने इसका जिक्र भी किया था। स्वामीजी ने एक बार अपने एक भाषण में कहा- भले ही मैं अपने जीवन के 40 वर्ष पूरे न कर सकूं पर मैं लोगो को शिक्षा देता रहूंगा, जब तक मनुष्य अपने देवत्व को प्राप्त न कर ले। गौरतलब है कि स्वामीजी 40 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर सके थे। महज 39 साल की उम्र में इस विश्व विजयी सन्यासी की सांसे थम गई थीं पर वे अपना काम कर चुके थे। अमेरिका में विश्व धर्म संसद का उनका ओजपूर्ण वक्तव्य विश्व विरासत में शामिल हो चुका था।