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जबलपुर . मप्र हाईकोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण करते हुए कहा कि पीडि़त युवक को वैवाहिक संबंध की पुर्नस्थापना के लिए फैमली कोर्ट के समक्ष जाना था। लेकिन उसने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता युवक पर एक हजार रुपए कॉस्ट लगा दी। जस्टिस नंदिता दुबे की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता की पत्नी की इच्छा पर उसे माता-पिता के साथ रहने की अनुमति दे दी।
यह है मामला
सीधी जिले के चुरहट थानांतर्गत जिला चूल्ही ग्राम निवासी अरविन्द कुमार विश्वकर्मा ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कहा कि उसकी पत्नी अरुणा विश्वकर्मा को उसके पिता राममणि विश्वकर्मा व मां शेषकली विश्वकर्मा ने भोपाल के अयोध्या बायपास रोड स्थित अर्जुन नगर में बंधक बना रखा है। हाईकोर्ट के निर्देश पर अरुणा को मुक्त कराकर सीधी पुलिस के आरक्षक सुरसरि प्रसाद ने कोर्ट में पेश किया।
मर्जी से पिता के साथ रह रही-
अरुणा ने कोर्ट को बताया कि वह अपनी मर्जी से अपने माता-पिता के साथ रह रही है। उसकी पति से अनबन के कारण वह पिछले डेढ़ साल से मायके में है। उसे बंधक बनाने का आरोप निराधार है। वह बालिग है और अपनी इच्छा से मायके में रह रही है।
कोर्ट ने लगाई कॉस्ट
सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पास वैवाहिक संबंध की पुर्नस्थापना के लिए फैमली कोर्ट जाने का विकल्प खुला था। इसके बावजूद उसने हाईकोर्ट में बंदीप्रत्यक्षीरण याचिका दायर कर कोर्ट का समय खराब किया। याचिकाकर्ता सात दिन के अंदर 1000 रुपए जुर्माना जमा करने का निर्देश दिया गया। सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता पारितोष गुप्ता ने पक्ष रखा।
Published on:
30 Oct 2019 09:36 pm
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