
mental weak children's beautiful life
जबलपुर। वे अपने परिजनों पर बोझ बन गए हैं, उनको अपने भाई बहनों जैसा प्यार भी नहीं मिलता है। क्योंकि वे सामान्य बच्चे नहीं है बल्कि स्पेशल बच्चे हैं। जिन्हें समाज अक्सर मंदबुद्धि कहता है। शहर की एक महिला ने इन मासूमों का दर्द समझा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर समाज की मुख्यधारा में रहकर आत्मसम्मान के साथ जीना सिखा रही है। जिसके लिए उन्होंने जीवन समर्पित कर दिया है।
तिरस्कार देख पीड़ा का एहसास हुआ
जबलपुर निवासी सुलेखा क्षत्रिय 48 वर्ष पेशे से डॉक्टर पंकज क्षत्रिय की पत्नी हैं। दोनों अक्सर जरूरतमंदों की मदद करने शहर की गलियों में निकल पड़ते हैं। सुलेखा ने बताया कि साल 2010 में एक बार एक मंदबुद्धि बच्चे का लोग तिरस्कार कर रहे थे, जिसे पीड़ा एहसास किया खुद पर, तब इनका जीवन सुधारने का विचार आया और संकल्पित हो गई कि अब पूरा जीवन इनको समर्पित करना है।
खोजे बच्चे और परिजनों को एहसास कराया
सुलेखा बताती हैं कि मंदबुद्धि या मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पहले खोजा, फिर उनके परिजनों से मिलकर उनके स्पेशल होने का एहसास कराया। उन बच्चों को शिक्षा, हुनर और कला के प्रति रूझान को देखकर मदद की। जिसका परिणाम ये हुआ कि दो तीन साल में ही परिजनों पर आश्रित रहने वाले अधिकतर बच्चे खुद के काम करने के अलावा छोटा मोटा काम भी करने लगे थे। जिससे प्रेरणा मिलती गई।
कमी खली तो खोल लिया स्कूल
सुलेखा के अनुसार बच्चों को उनके काम सिखाने व हुनर को तराशने के लिए एक कमी खल रही थी। जिसके बाद बिना किसी सरकारी सहयोग के एक स्कूल खोला। जिसमें परासिया, कटनी, परियट, छिंदवाड़ा, पाटन समेत जबलपुर आदि शहरों के बच्चों को रहने खाने व शिक्षा की मुफ्त व्यवस्था की। यहां बच्चों के ट्रेनर भी एजुकेटेड व ट्रेंड हैं, पूरा स्टाफ महिलाओं का है। जिनमें विधवा, बुजुर्ग, गरीब तबके की हैं जो पूरी तन्मयता से बच्चों का ख्याल रखती हैं। यहां जो भी आता है उसे प्रवेश दे देते हैं।
सेलिब्रेशन से मिलती है सहायता
बच्चों के साथ शहर के लोग अपना व बच्चों का जन्मदिन, पुण्यतिथि, त्यौहार आदि सेलिब्रेट करने आते हैं। जो वे दान देते हैं उसमें अनाज, कपड़ा व अन्य जरूरत की चीजें ही लेते हैं। स्कूल का पूरा खर्च स्वयं के साथ दोस्त, परिजनों की हेल्प से पूरा होता है।
बच्चे करने लगे पेंटिंग, करते हैं डांस
स्कूल में पढऩे वाले लडक़े लड़कियां डांस करना सीख गए हैं, वे पेपर बैग बना लेते हैं, पेंटिंग भी कर लेते हैं। जब वे आए थे तब खुद ब्रश भी नहीं कर पाते थे और खाना नहीं खा पाते थे। अब उनका हुनर दिखाई देने लगा है। अभी तक सैकड़ों बच्चों को हुनरमंद बनाया, ताकि वे परिवार पर बोझ न बनें। समाज मुख्य धारा से जुड़े रहें। आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए पूरा समय देते हैं। काम सिखाने के बाद उनके रोजगार की व्यवस्था भी कर रहे हैं। ताकि परिवार वालों के साथ मिलकर वे जीवन यापन कर सकें।
Published on:
09 Oct 2020 03:57 pm
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