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घोटपाल मेला में दिखी आदिवासी संस्कृति की बहुरंगी झलक…पढ़ें पूरी खबर

दक्षिण बस्तर में घोटपाल मेला का बड़ा महत्व है यह मेला काफी बड़ा है तथा इसको लेकर कई मान्यताएं प्रचलित है इस मेले में आसपास के कई देवी देवता शिरकत करते हैं मेला में विधि विधान से इनका पूजन भी होता है इस मेला के बाद ही दक्षिण बस्तर के अन्य मेला भरने की शुरुआत होती है

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घोटपाल मेला में पहुचे देवी देवता

दक्षिण बस्तर जिला दंतेवाडा का सबसे बड़ा मेला है घोटपाल

शैलेन्द्र ठाकुर की रिपोर्ट...

दंतेवाडा @ गीदम ब्लाॅक के घोटपाल में बहुरंगी आदिवासी संस्कृति की झलक के लिए प्रसिद्ध मेला भरने के साथ ही दक्षिण बस्तर में मेले मंडईयों का दौर शुरू हो गया है। घोटपाल मेला इस क्षेत्र का पहला सबसे बड़ा मेला माना जाता है, जिसके बाद मानसून आगमन तक लगातार इस तरह के मेले-मंडई अन्य जगहों पर आयोजित होते हैं। परंपरानुसार इस बार भी घोटपाल मेला का आयोजन मंगलवार को हुआ। कंधे पर आंगा-कोला देव के प्रतीक के तौर पर चौकोर और मोर पंखों से सजे लंबे विग्रहों को धारण किए सिरहा और उनके साथ ग्रामीणों का अपार जनसमूह का थिरकना इस आयोजन को और भी खास बना देता है। उसेंडी तादो देव मंदिर के प्रांगण में भरने वाले मेले में शामिल होने के लिए दूर-दराज के गांवों से ग्रामीण पहुंचे। ग्रामीण छोटे आकार के देव ढोल लेकर आए थे। ढोल वादकों में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे। श्रृंगार से पहले देवी-देवताओं को पास के तालाब में नहलाकर उनके प्रतीक को मोरपंख और पारंपरिक आभूषणों से सजाया गया, फिर मन्नत के अनुसार चढ़ावे भी अर्पित किए गए। बस्तर सांसद दीपक बैज, दंतेवाड़ा विधायक देवती कर्मा, कलेक्टर दीपक सोनी व जन प्रतिनिधियों ने भी पहुंचकर उसेंडी देव का आशीर्वाद लिया। कलेक्टर सोनी भी ग्रामीणों के उत्साह में शरीक होने से खुद को रोक नहीं पाए और ढोल वादन कर नृत्य का लुत्फ उठाया।

उसेंडी देव से मिलने आए परिजन

इस आयोजन में उसेंडी तादो देव के परिजन मसेनार, बिंजाम, कुहचेपाल, कोरलापाल, तारलापाल व कटुलनार से हर साल मिलने पहुंचते हैं। उसेंडी देवता के बिंजाम निवासी पुत्र हुंगा, वेल्ला और बोमड़ा देव का आगमन एक दिन पहले सोमवार को यहां पहुंच जाते हैं। बड़ा मेला भरने से पहले पखवाड़े भर तक स्थानीय आदिवासी रोजाना शाम को ढोल बजाकर देव जागरण करते हैं। बड़ा मेला के दिन रात भर ढोल बाजे के साथ नृत्य का क्रम चलता है, फिर अगले दिन देवी-देवताओं की विदाई हो जाती है।

इन गांवों से आए रिश्तेदार

घोटपाल में उसेंडी देव के दरबार में हाजिरी लगाने दूर-दराज से आए परिजनों में हारिका, बिसरा, लिंगा देवा, हादुर कारली से हुंगा, गद बोमड़ा, इर्स हुंगाल, उठा बडया, जाबुर हुंगा, चेरलापाल से बंड कुंवार, कंडहिरे, कंडपालो, कोरलापाल से बोमड़ा, मसेनार से गदाहारिक, जात बोमड़ा, देवा, कटुलनार से हिरे, हिरे बिसरा, हिरे हारिक, कोहला कोसो, बोमड़ा, दल अनाल, विश्रदेवी, तारलापाल से कुंवर पेन, कंडहिरे, पाली व बोमड़ा शामिल हैं।