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Naxal Terror : कहां जाए आदिवासी ?... नक्सली आतंकों और पुलिस के बीच निर्दोषी गंवा रहे जान, मानवाधिकार भी असुरक्षित

locationजगदलपुरPublished: Dec 11, 2023 01:22:36 pm

Submitted by:

Kanakdurga jha

Chhattisgarh Naxal Terror : एक ओर आदिवासियों को नक्सली व नक्सल सहयोगी के नाम पर जेल में सालों तक रखती और फर्जी मुठभेड़ में इन्हें नक्सली बताकर मारा जाता है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली भी इन्हें नहीं छोड़ते। नक्सली इन्हें पुलिस का मुखबिर बताकर मार देते हैं।

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Naxal Terror : बस्तर में नक्सली और पुलिस के बीच मुठभेड़ होते रहे हैं। जिसका सबसे ज्यादा नुकसान बस्तर के आदिवासियों का हो रहा है। पुलिस हो या नक्सली दोनों ही तरफ के निशाने पर आदिवासी ही है। विश्व मानवाधिकार के मौके पर पत्रिका ने जाना कि बस्तर में पुलिस-नक्सल के बीच आदिवासी की स्थिति चक्की के दो पाटों के बीच पिसने जैसी है। एक ओर आदिवासियों को नक्सली व नक्सल सहयोगी के नाम पर जेल में सालों तक रखती और फर्जी मुठभेड़ में इन्हें नक्सली बताकर मारा जाता है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली भी इन्हें नहीं छोड़ते। नक्सली इन्हें पुलिस का मुखबिर बताकर मार देते हैं।
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सबसे खराब बात यह है कि सरकारें भी इन आदिवासियों को न्याय दिलाने में विफल साबित हो रहीं हैं या यह कहिए कि इसके लिए प्रयास भी नहीं करती। तभी तो बस्तर में अब तक हुई घटनाओं को लेकर बने न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। बस्तर के लिए अब तक बने पांच न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सामने आ चुकी है, लेकिन सरकार की तरफ से इसपर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
आयोग के रिपोर्ट देने के बाद भी नतीजे शून्य

बस्तर में पिछले 10 सालों में पांच बड़ी घटनाओं पर न्यायिक जांच आयोग गठित की गई। इसमें ताड़मेटला, सारकेगुड़ा, एडसमेटा, झीरमघाटी और भीमा मंडावी हत्याकांड शामिल हैं। सबसे शर्मनाक बात है कि इनमें से चार मामले की रिपोर्ट को आने में 8-8 साल तक गए। इसके बाद भी जब आयोग ने रिपोर्ट पेश की तो इस पर कार्रवाई तक नहीं हुई है। आदिवासी आज भी अपने न्याय के अधिकार के तहत सरकार की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं, लेकिन नतीजा नहीं आ रहा। आदिवासियों की लड़ाई अभी भी जारी है।
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ऐसा नहीं है कि आदिवासी सिर्फ पुलिस से ही प्रताड़ित है बल्कि उनका नक्सलियों के हाथों भी जान का नुकसान हो रहा है। नक्सली जिनसे दुश्मनी होती है उन पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाकर उनकी हत्या कर देते हैं। कई बार यह हत्या इतनी दर्दनाक होती है कि जनअदालत में नक्सली सैकड़ों ग्रामीणों व उनके परिवार वालों के सामने गला रेंत देते हैं। इतना ही नहीं संगठन में जोड़ने से लेकर उनके लिए छोटी मोटी चीजें उपलब्ध कराने के लिए भी दबाव बनाते हैं। जो बाद में नक्सल सहयोगी होने का आधार बन जाता है। पिछले तीन साल की तरफ ही नजर डालें तो अब तक नक्सलियों ने 40 से अधिक लोगों को मुखबीरी के नाम पर हत्या कर दी है।
मुठभेड़ तो कभी फर्जी गिरफ्तारी से परेशान

आदिवासियों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां दर्जनों मामले हैं जिसे आदिवासियों ने फर्जी बताया है। इसमें मुठभेड़ व आदिवासियों की मौत दोनों शामिल है। कई मामले तो न्यायिक आयोग तक में पहुंचे और आयोग ने भी इसे फर्जी बताया है। एडसमेटा और सारकेगुड़ा इसके उदाहरण हैं जिनकी रिपोर्ट आयोग ने सरकार को सौंप दी है। फिर भी कुछ नहीं हुआ।
सालों तक नहीं होता ट्रायल, फिर दोषमुक्त

बस्तर में बुरकापाल की एक घटना है जिसमें पुलिस ने घटना के बाद अलग-अलग इलाकों से करीब 122 लोगों को नक्सली या उनका सहयोगी बताकर गिरफ्तार किया था। पहले तो कई सालों तक इनका ट्रायल ही नहीं हुआ। इसके बाद करीब ट्रायल शुरू हुआ तो पुलिस इन्हें नक्सली साबित नहीं कर पाई। अंत में अदालत ने सभी 122 को दोषमुक्त किया। ऐसे कई मामले हैं, जिनमें मानव अधिकार का सीधा उल्लंघन होता रहा।

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