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लोहांडीगुड़ा में पारापुर के जंगलों में मिला नया जलप्रपात, ग्रामीणों ने नाम दिया डुंगे

- बारिश में बस्तर में निकल आते है मनमोहक प्रपात व नाले।- पहली बार पत्रिका के जरिए सामने आ रही इस जलप्रपात की तस्वीर- अब तक पर्यटकों की नजरों से दूर रहा था स्थल।

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लोहांडीगुड़ा में पारापुर के जंगलों में मिला नया जलप्रपात, ग्रामीणों ने नाम दिया डुंगे,लोहांडीगुड़ा में पारापुर के जंगलों में मिला नया जलप्रपात, ग्रामीणों ने नाम दिया डुंगे

जगदलपुर. प्रकृति की गोद में बसे बस्तर में आज भी कई ऐसे इलाके हैं जों बेहद खूबसूरत होने के साथ साथ रोमांच से भरे हैं। स्थानीय लोगों या फिर सीमित लोगों तक इसकी जानकारी की वजह से यहां तक लोग पहुंच ही नहीं पाये हैं। ऐसे ही एक वाटरफॉल लोहांडीगुड़ा के पारापुर इलाके में है। स्थानीय शिक्षक रेहाना सिद्धिकी और चमन लाल मौर्य के साथ मिलकर इस इलाके के सबसे खूबसूरत जगहों को पहली बार पत्रिका ने खोज निकाला है। उबड़-खाबड़ रास्ते और मुख्य मार्ग से करीब तीन किमी अंदर इस डुंगे जलप्रपात की जानकारी बेहद सीमित लोगों को ही है। यही वजह है कि अब तक यह देश दुनिया से अछुता रहा।

ऐसे पहुंच सकते हैं यहां तक
यहां तक पहुंचने के लिए दो रास्ते पर्यटक ले सकते हैं पहला लोहांडीगुड़ा से पारापुर पहुंचते हुए एक कच्ची सडक़ का सहारा लेकर सीधे डुंगे जलप्रपात तक पहुंचा जा सकता है। वहीं इसके अलावा यदि आप जगदलपुर से होते हुए जा रहे हैं तो सबसे आसान रास्ता लोहांडीगुड़ा से पहले बड़ांजी से ही गढिय़ा के लिए कट जाएं। यहां से आगे मांदर होते हुए तारापुर पहुंचे। यहां से स्कूलपारा होते हुए कच्ची सडक़ से होते हुए इस जलप्रपात तक पहुंचा जा सकता है। यहां कच्चे और उबड़ खाबड़ रास्तों को पार करने के बाद जैसे ही यहां पहुंचेंगे यहां की खूबसूरती देख सारी थकान दूर हो जाएगी।

धीरे-धीरे घट रही इस जलप्रपात की उंचाई
चमनलाल मौर्य और रेहाना सिद्धिकी ने बताया कि वह इस जलप्रपात की उंचाई धीरे-धीरे घट रही है। पहले यह १० फीट से भी उंचा था। लेकिन परतदार चट्टानों को बारिश के समय तेज बहाव के चलते इसका लगातार कटाव हो रहा और इसकी उंचाई कम होती जा रही है। अब इसकी उंचाई पांच से ८ फीट तक हो गई है। लेकिन यहां की सीढ़ी नुमा आकृति से पानी का गिरना मन मोह लेता है। यही वजह है कि पिकनिक के लिए यहां जानने वाले लोग जरूर पहुंचते हैं।

डुंगे जलप्रपात में होता है मत्स्याखेट
ग्रामीणों की मानें तो यहां मत्स्याखेट किया जाता हो. ग्रामीण पिछले लंबे समय से इस जगह पर स्थानीय शिलाओं से प्रपात के नीचे मत्स्याखेट करते आ रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि आस-पास के ग्रामीणों को ही केवल इस जलप्रपात के बारे में पता है।