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सर्दियों के मौसम में इन मोटे अनाजों को खाते हैं बस्तर के आदिवासी, कई बीमारियों के लिए हैं रामबाण इलाज

Kodo And Kutki Millets: बस्तर के आदिवासी काफी समय से मोटे अनाज का प्रयोग करते आ रहे हैं जो स्वास्थय की दृष्टि से भी काफी ज्यादा फायदेमंद है। आदिवासियों द्वारा खाए जाने वाले प्रमुख और मोटे अनाज में रागी कोदो कुटकी,ज्वार, बाजरा, मक्का इत्यादि शामिल हैं।

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File photo

Kodo And Kutki Millets: छत्तीसगढ़ राज्य को "मध्य भारत का चावल का कटोरा" कहा जाता है। यह भारत के सबसे बड़े कृषि उत्पादक राज्यों में छठे स्थान पर है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें चावल, मक्का और कुछ अन्य बाजरा जैसे तिलहन, और मूंगफली आदि हैं। छत्तीसगढ़ में, चावल मुख्य फसल यानी चावल पूरे क्षेत्र में लगभग 77 प्रतिशत बोया जाता है। छत्तीसगढ़ में तीन कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं और छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों का लगभग 73 प्रतिशत, बस्तर का पठार का 97 प्रतिशत और उत्तरी पहाड़ियों का 95 प्रतिशत हिस्सा वर्षा आधारित है।

बस्तर के आदिवासी काफी समय से मोटे अनाज का प्रयोग करते आ रहे हैं जो स्वास्थय की दृष्टि से भी काफी ज्यादा फायदेमंद है। आदिवासियों द्वारा खाए जाने वाले प्रमुख और मोटे अनाज में रागी कोदो कुटकी,ज्वार, बाजरा, मक्का इत्यादि शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार कोदो-कुटकी को प्रोटीन व विटामिनयुक्त माना गया है। इसके सेवन से शुगर व बीपी आदि रोगों में लाभ मिलने की बात सामने आई है। बस्तर की आदिवासी संस्कृति व खान-पान में कोदो-कुटकी जैसे लघुधान्य फसलों का महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से इस पर लगातार अनुसंधान कार्य किए जा रहे हैं। इन उत्पादों के विभिन्न स्वरूप में व्यवसायीकरण की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।

कोदो
कोदो एक मोटा अनाज है, जिसे अंग्रेजी में कोदो मिलेट या काउ ग्रास के नाम से जाना जाता है। कोदो के दानों को चावल के रूप में खाया जाता है और स्थानीय बोली में भगर के चावल के नाम पर इसे उपवास में भी खाया जाता है। कोदो का वानस्पतिक नाम पास्पलम स्कोर्बीकुलातम है और यह भारत के अलावा मुख्य रूप से फिलिपींस, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका में उगाया जाता है।

कोदो आदिवासियों का एक मुख्य भोजन रहा है और इससे जुड़े कई मिथक भी सुनने को मिलते हैं। इसके दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा तथा 65.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाई जाती है। कोदो-कुटकी मधुमेह नियंत्रण, गुर्दो और मूत्राशय के लिए लाभकारी है। यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है। कोदो-कुटकी हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए रामबाण है। इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है। शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है। इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है।

कुटकी
कुटकी का वैज्ञानिक नाम पनिकम अन्तीदोटेल (Panicum antidotale) है। यह मुख्य रूप से पंजाब, गंगा के मैदान तथा हिमालय में पाई जाती है, यह भी पनिकम परिवार की घास है। आकर में यह कोदो के दानों से छोटे होते हैं। कुटकी पचने में हल्की, पित्त और कफ की परेशानी को ठीक करने वाली, भूख बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी है। यह बुखार, टॉयफॉयड, टीबी, बवासीर, दर्द, डायबिटीज आदि में भी लाभ पहुंचाती है। इसके साथ ही कुटकी सांसों की बीमारी (सांसों का उखड़ना या फूलना), सूखी खाँसी, खून की अशुद्धता, शरीर की जलन, पेट के कीड़े, मोटापा, जुकाम आदि रोगों में भी मदद करती है।

कांकेर जिले में रहने वाले तिहारु राम मरकाम जो कि खुद एक आदिवासी समुदाय से हैं, उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि आदिवासी सर्दियों के मौसम में मोटे अनाज के तौर पर कोदो, कुटकी,ज्वार , मक्का बाजरा इत्यादि खाते हैं। कोदो की बाड़ यानि बढ़ने की क्षमता कुटकी से कम होती है और इसके दाने कुटकी से बड़े होते हैं। कोदो कुटकी को आमतौर पर क्वांर से कार्तिक में खाया जाता है।